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पूर्वी चम्पारण

रह-स्यों से भरा चम्पारण का केसरिया स्तूप, आप हैरान जरूर होंगे

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रहस्यों से भरा, चम्पारण का केसरिया स्तूप भगवान बुद्ध जब महापरिनिर्वाण ग्रहण करने कुशीनगर जा रहे थे तो वह एक दिन के लिए चम्पारण के केसरिया में ठहरें थे. जिस स्‍थान पर पर वह ठहरें थे उसी जगह पर कुछ समय बाद सम्राट अशोक ने, उनकी याद में एक स्‍तूप का निर्माण करवाया था, जो केसरिया बौद्ध स्तूप के नाम से प्रसिद्द है. कहा जाता है कि यहीं बुद्ध ने प्रसिद्ध संत अलार कलाम से दीक्षा लेकर राजसी वस्त्र का त्याग किया था और केसरिया वस्त्र पहनकर वैशाली की ओर चल पड़े थे, जहां से वे गंगा पार कर गया पहुंचे और ज्ञान की प्राप्ति की. यहीं नहीं अपने महापरिनिर्वाण का आभास होते ही भगवान बुद्ध जब कुशीनगर की ओर जा रहे थे तो केसरिया में अपने प्रिय शिष्य आनंद को भिक्षा पात्र देकर यहीं से वापस किया था. वर्तमान में यह स्‍तूप 30 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी ऊंचाई 104 फीट है. इतिहासकार अलेक्‍जेंडर कनिंघम के अनुसार मूल स्‍तूप 150 फीट ऊंचा था. वर्ष 2001 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पुरातत्ववेत्ता के के साहब ने इसे विश्व का सबसे ऊंचा स्तूप घोषित किया. केसरिया, चंपारण से 34 किलोमीटर दूर दक्षिण साहेबगंज-चकिया मार्ग पर लाल छपरा चौक के पास, ताजपुर देउर में स्थित है.

धन के लालच में शुरू हुआ उत्खनन, विश्व के सात आश्चर्यो में हो सकता था शामिल चंपारण के केसरिया की चर्चा वेदकालीन रचित कई पुराणों व धर्म ग्रंथों में मिलती है. केसरिया स्थित बौद्ध स्तूप का उत्खनन अगर वर्ष 1814 में पूरी तरह कर्नल मैकेंजी ने कराया होता तो विश्व का सबसे पुराना व ऊंचा स्तूप आज दुनिया के सात आश्चर्यो में शामिल होकर भारत का गौरव बढ़ा रहा होता. उत्कृष्ट वास्तुकला के इस नायाब नमूने का प्रतिरूप दुनिया में कहीं और नहीं है. अंग्रेजी सल्तनत का यह कर्नल स्तूप को राजा बेन का किला समझ कर खुदाई कराया था. उसे आशा थी कि यहां कोई राजमहल है और यहां बड़ा खजाना दबा हो सकता है. कर्नल मैकेंजी ने इसकी चर्चा अपनी आत्मकथा में की है. अगर मैकेंजी इस स्तूप का पूरी तरह उत्खनन कराया होता तो केसरिया भी पूरे देश की ओर से विश्वमंच पर अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करा चुका होता, क्योंकि इतना पुराना व ऊंचा विश्व में कोई स्तूप नहीं है.

खुदाई से पूर्व दशकों नहीं, सदियों तक इसकी पहचान देउर के रूप में रही और लोग इसे क्षेत्रीय राजा वेन के गढ़ की मान्यता देते थे. जिला प्रशासन की पहल पर 1995 में इस जगह का दौरा कर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के लोगों ने इसे खुदाई के लिए चिह्नित किया था. इसके बाद 1998 में इस ऐतिहासिक स्थल की खुदाई शुरू हुई तो यह स्तूप दुनिया का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप माना गया और सांची स्तूप ऊंचाई के मामले में दूसरे नंबर पर आ गया. साल 2001 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, पुरातत्ववेत्ता मो के के साहब ने केसरिया स्तूप को विश्व का सबसे ऊंचा स्तूप घोषित किया

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार यह विशाल स्तूप तीसरी शताब्दी का है. इस प्राचीन स्थल को पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग द्वारा 1958 में खोजा गया. सर्वेक्षण का पुरा काम पुरातत्वविद् के. मुहम्मद के निर्देशन में हुआ. सर्वेक्षण से पहले इस स्थल को प्राचीन शिव मंदिर माना जा रहा था. खुदाई के दौरान यहां प्राचीन काल की कई अन्य चीजों प्राप्त की गई हैं, जिनमें बद्ध की मूर्तियां, तांबे की वस्तुएं, इस्लामिक सिक्के आदि. गंडक नदी के किनारे अवस्थित केसरिया एक महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल है। खुदाई में जब यह स्पष्ट हो गया कि यह दुनिया का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप है तो पूरी दुनिया को इसके बारे में पता चला. इसके साठ फीसद हिस्से की ही खुदाई हो पाई है. अनुमान है कि स्तूप से लेकर दक्षिण दिशा में बहती गंडक नदी तक चौड़ी सड़क अब भी जमींदोज है.

और जब भगवान ने नदी में कृत्रिम बाढ़ से रास्ता रोका.गंडक नदी के किनारे स्थित केसरिया बौद्ध स्थल का इतिहास काफी पुराना व समृद्ध है. बौद्ध आख्यानों के मुताबिक महापरिनिर्वाण के वक्त वैशाली से कुशीनगर जाते गौतम बुद्ध ने एक रात केसरिया में बिताई थी.जब वह अपनी इस यात्रा पर थे, तब लिच्छवी गणराज्य के लोगों ने भी उनके साथ चलने को कहा. भगवान बुद्ध के मना करने के बावजूद उन लोगों ने उनका साथ नहीं छोड़ा. लिच्छवी जब बहुत प्रयास करने के बावजूद भी नहीं माने तो, भगवान बुद्ध ने नदी में कृत्रिम बाढ़ उत्पन्न कर दी. लिच्छवी लोगों का समूह इससे बहुत निराश था. उन लोगों के निराश चेहरे को देखते हुए भगवान ने उन्हें अपना भिक्षा मांगने वाला कटोरा दे दिया. इस किवदंती के अनुसार ही यह कहा जाता है कि लिच्छवी लोगों ने बुद्ध के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए इस स्तूप का निर्माण किया. एक मत के अनुसार इसका निर्माण सम्राट अशोक ने करवाया था. जबकि कुछ लोगों का मानना है कि यह गुप्तकाल से ही यहाँ मौजूद है. कुछ आख्यानों के मुताबिक भिक्षा पात्र उन्होंने अपने शिष्य आनंद को दे दिया था.

फाह्यान और ह्यून त्सांग ने भी यहाँ की है यात्रा जब शुरुआत में इसे बनाया गया तब यह मिट्टी या कच्चा था. जो समय के साथ बनता गया और आज के स्तूप के रूप में मौजूद है. इस स्तूप के आसपास रानीवास, केसर बाबा का मंदिर आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल भी मौजूद हैं. इस जगह का महत्व इतना ज्यादा है कि फाह्यान और ह्यूनत्सांग ने भी इस जगह पर आ चुके हैं. उन्होंने यहाँ आने के बाद इस स्तूप के बारे में एक नोट भी छोड़ा था. पांचवी शताब्दी में एक बौध भिक्षु फाह्यान ने भगवान बुद्ध के कटोरे के ऊपर बने एक जगह के बारे में जिक्र किया है. माना जाता है कि वह कोई और नहीं बल्कि केसरिया स्तूप ही था, जिसका जिक्र उन्होंने किया था.

rajan@Jhalkoindia.com

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