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पूर्वी चम्पारण

राजकुमार शुक्ल ~ एक कम पढ़ा-लिखा किसान, जिसकी जिद ने गांधी को महात्मा बना दिया.

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राजकुमार शुक्ल ~ एक कम पढ़ा-लिखा किसान, जिसकी जिद ने गांधी को महात्मा बना दिया :

समय था 1917, और स्थान था चम्पारण. अंग्रेजों की तिनकठिया प्रथा (किसानों से नील की जबरन खेती करने का एक अंग्रेजी कानून) के खिलाफ चम्पारण के किसान मैदान में कूद पड़े थे, लेकिन उनके पास एक स्पष्ट राजनीतिक अनुभव और नेता की कमी थी. किसानों को किसी भी तरह जबरन नील की खेती और ब्रिटिश प्रताड़ना से मुक्ति पाना था. तभी आंदोलन में एक बहुत कम पढ़े – लिखे मगर दूरदर्शी नेता की एंट्री हुई. और दूसरी तरफ इसी दौरान अपने राजनैतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के सुझाव पर भारत को समझने के लिए गाँधी भारत भ्रमण पर निकले थे. फिर क्या ?

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दक्षिण अफ्रीका में अपने सत्याग्रह से पूरी दुनिया का अपनी तरफ ध्यान खींचने वाले और बर्बर ब्रिटिश शासन को शर्मसार करने वाले गाँधी के हाथों में किसानों के आंदोलन का नेतृत्व सौंपने के लिए वो काम पढ़ा – लिखा किसान निकल पड़ा गाँधी की खोज में. गाँधी से मिलने के लिए उस किसान ने दिसंबर 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में भाग लिया. इस सीधे-सादे लेकिन जिद्दी शख्स ने वहां गाँधी से मुलाकात की और अपने इलाके के किसानों की पीड़ा और अंग्रेजों द्वारा उनके शोषण की दास्तान बताई और उनसे आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए कहा. लेकिन गांधी पहली मुलाकात में इस शख्स से प्रभावित नहीं हुए और यही वजह थी कि उन्होंने उस किसान के अनुरोध को टाल दिया. लेकिन इस कम-पढ़े लिखे लेकिन जिद्दी किसान ने गांधी से बार-बार मिलकर उन्हें अपना आग्रह मानने को बाध्य कर दिया.

और अंततः कमिश्नर की अनुमति न मिलने के बाद भी महात्मा गांधी ने 15 अप्रैल 1977 को चंपारण की धरती पर अपना पहला कदम रखा. गाँधी गिरफ्तार हुए, बिना जमानत के रिहा हुए, और किसानों के सहयोग और समर्थन से बिना कांग्रेस का प्रत्यक्ष साथ लिए हुए अहिंसक तरीके से लड़ी गई लड़ाई के बल पर अंग्रेजी सरकार को झुका दिया. जुलाई 1917 में ‘चम्पारण एग्रेरियन कमेटी’ का गठन किया गया. गाँधी जी भी इसके सदस्य थे. इस कमेटी के प्रतिवेदन पर ‘तिनकठिया प्रणाली’ को समाप्त कर दिया गया और किसानों से अवैध रूप से वसूले गए धन का 25 प्रतिशत वापस कर दिया गया. 1919 ई. में ‘चम्पारण एग्रेरियन अधिनियम’ पारित किया गया, जिससे किसानों की स्थिति में सुधार हुआ.

इसका परिणाम यह हुआ कि यहां पिछले 135 सालों से चली आ रही नील की खेती धीरे-धीरे बंद हो गई, साथ ही किसानों का शोषण भी हमेशा के लिए खत्म हो गया. जमींदारों के लाभ के लिए नील की खेती करने वाले किसान अब अपने जमीन के मालिक बन गए. इसी के साथ गांधीजी ने भारत में सत्याग्रह की पहली विजय का शंख फूँका और चम्पारण भारत में सत्याग्रह की जन्म स्थली बन गया. चंपारन आंदोलन में ही गांधी जी के कुशल नेतृत्व से प्रभावित होकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें पहली बार महात्मा के नाम से संबोधित किया और तभी से लोग उन्हें महात्मा गांधी कहने लगे. गांधी को भी इतनी जल्दी सफलता का भरोसा न था, लेकिन ये उस दुबले – पतले किसान के तप, त्याग और संघर्ष का ही फल था, जिसके बल पर कठियावाड़ी ड्रेस में पहुंचे बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी चंपारण से ‘महात्मा’ बनकर लौटे. बैरिस्टर गांधी को महात्मा बनाने वाले उस किसान का नाम था,

राजकुमार शुक्ल. यानी चम्पारण के असली राजकुमार :

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुए आंदोलनों में चम्पारण का किसान आंदोलन सबसे अलग महत्त्व रखता है, क्योंकि इस आंदोलन ने पहली बार बर्बर ब्रिटिश हुकूमत को किसानों के सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. यह आंदोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी आंदोलन के दौरान गाँधी को न सिर्फ महात्मा की उपाधि मिली बल्कि वो पहली बार भारतीय आम जनमानस के पटल पर एक नेता बनकर उभरे. इसी आंदोलन के दौरान संत राउत ने पहली बार गांधी को बापू कहके पुकारा. गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा का भारत में पहला प्रयोग चंपारण की धरती पर ही किया.

गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह और अहिंसा के अपने आजमाए हुए अस्र का भारत में पहला प्रयोग चंपारण की धरती पर किया. यहीं उन्होंने यह भी तय किया कि वे आगे से केवल एक कपड़े पर ही गुजर-बसर करेंगे. इसी आंदोलन के बाद उन्हें ‘महात्मा’ की उपाधि से विभूषित किया गया. देश को राजेंद्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी, मजहरूल हक, ब्रजकिशोर प्रसाद जैसी महान विभूतियां भी इसी आंदोलन से मिलीं. इन तथ्यों से समझा जा सकता है कि चंपारण आंदोलन को सफल बनाने वाले “चम्पारण के राजकुमार” का गांधी को महात्मा बनाने में कितन योगदान है ? इस आंदोलन से ही देश को नया नेता और नई तरह की राजनीति मिलने का भरोसा पैदा हुआ. और ये सब कुछ मुमकिन हुआ चम्पारण के राजकुमार की तपस्या से.

राजकुमार के बारे में गाँधी के विचार

राजकुमार शुक्ल और उनकी जिद न होती तो चंपारण आंदोलन से गांधी का जुड़ाव शायद ही संभव हो पाता. राजकुमार शुक्ल का जन्म 23 अगस्त 1875 को चम्पारण में हुआ था. गांधीजी को चंपारण बुलाने के लिए एक जगह से दूसरी जगह दौड़ लगाते रहे. चिट्ठियां लिखवाते रहे. चिट्ठियां गांधीजी को भेजते रहे. पैसे न होने पर चंदा करके, उधार लेकर गांधीजी के पास जाते रहे. कभी अमृत बाजार पत्रिका के दफ्तर में रात गुजारकर कलकत्ता (कोलकाता) में गांधीजी का इंतजार करते रहते. कई बार अखबार के कागज को जलाकर खाना बनाकर खाते तो कभी भाड़ा बचाने के लिए शवयात्रा वाली गाड़ी पर सवार होकर यात्रा करते. राजकुमार शुक्ल के ऐसे कई प्रसंग हैं. खुद गांधीजी ने अपनी आत्मकथा ‘माई एक्सपेरिमेंट विद ट्रूथ’ में राजकुमार शुक्ल पर एक पूरा अध्याय लिखा है.

अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ के पांचवें भाग के बारहवें अध्याय ‘नील का दाग’ में गांधी लिखते हैं कि, ‘लखनऊ कांग्रेस में जाने से पहले तक मैं चंपारण का नाम तक न जानता था. नील की खेती होती है, इसका तो ख्याल भी न के बराबर था. इसके कारण हजारों किसानों को कष्ट भोगना पड़ता है, इसकी भी मुझे कोई जानकारी न थी. राजकुमार शुक्ल नाम के चंपारण के एक किसान ने वहां मेरा पीछा पकड़ा. वकील बाबू (ब्रजकिशोर प्रसाद, बिहार के उस समय के नामी वकील और जयप्रकाश नारायण के ससुर) आपको सब हाल बताएंगे, कहकर वे मेरा पीछा करते जाते और मुझे अपने यहां आने का निमंत्रण देते जाते.’ लेकिन महात्मा गांधी ने राजकुमार शुक्ल से कहा कि फिलहाल वे उनका पीछा करना छोड़ दें. इस अधिवेशन में ब्रजकिशोर प्रसाद ने चंपारण की दुर्दशा पर अपनी बात रखी जिसके बाद कांग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित कर दिया.

इसके बाद भी राजकुमार शुक्ल संतुष्ट न हुए. वे गांधी जी को चंपारण लिवा जाने की जिद ठाने रहे. इस पर गांधी ने अनमने भाव से कह दिया, ‘अपने भ्रमण में चंपारण को भी शामिल कर लूंगा और एक-दो दिन वहां ठहर कर अपनी नजरों से वहां का हाल देख भी लूंगा. बिना देखे इस विषय पर मैं कोई राय नहीं दे सकता.’ इसके बाद गांधी जी कानपुर चले गए, लेकिन शुक्ल जी ने वहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. वहां उन्होंने कहा, ‘यहां से चंपारण बहुत नजदीक है. एक दिन दे दीजिए.’ इस पर गांधी ने कहा, ‘अभी मुझे माफ कीजिए, लेकिन मैं वहां आने का वचन देता हूं.’ गांधी जी लिखते हैं कि ऐसा कहकर उन्होंने बंधा हुआ महसूस किया.

इसके बाद भी इस जिद्दी किसान ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. वे अहमदाबाद में उनके आश्रम तक पहुंच गए और जाने की तारीख तय करने की जिद की. ऐसे में गांधी से रहा न गया. उन्होंने कहा कि वे सात अप्रैल को कलकत्ता जा रहे हैं. उन्होंने राजकुमार शुक्ल से कहा कि वहां आकर उन्हें लिवा जाएं. राजकुमार शुक्ल ने सात अप्रैल, 1917 को गांधी जी के कलकता पहुंचने से पहले ही वहां डेरा डाल दिया था. इस पर गांधी जी ने लिखा, ‘इस अपढ़, अनगढ़ लेकिन निश्चयी किसान ने मुझे जीत लिया.’

और जब चम्पारण के राजकुमार ने गाँधी को निरुत्तर कर दिया.

भैरवलाल दास द्वारा संपादित राजकुमार शुक्ल की डायरी में एक बेहद मार्मिक प्रसंग है. गांधी के चंपारण से जाने के बाद भी शुक्ल के संगठन का काम जारी रहता है. गाँधी के आह्वान पर रोलट एक्ट के विरुद्ध और असहयोग आंदोलन में भी वो बढ़चढ़कर हिस्सा लिए. इस दौरान वे चंपारण में किसान सभा का काम करते रहे. राजकुमार शुक्ल को गांधीजी की खबर अखबारों से मिलती रहती थी। उन्होंने उन्हें फिर से चंपारण आने के लिए कई पत्र लिखे पर गांधीजी का कोई आश्वासन नहीं मिला। शुक्ल अपनी जीर्ण-शीर्ण काया लेकर 1929 की शुरुआत में साबरमती आश्रम पहुंचे. कस्तूरबा उन्हें देखने ही रोने लगती हैं. 15-16 दिनों तक शुक्ल वहां रुकते हैं, तब गांधी से उनकी मुलाकात हो पाती है क्योंकि उस समय गांधी कहीं बाहर गए हुए होते हैं. गांधी को देखते ही राजकुमार शुक्ल की आंखें भर आती हैं. गांधी कहते हैं कि आपकी तपस्या अवश्य रंग लाएगी. राजकुमार पूछते हैं- क्या मैं वह दिन देख पाऊंगा? गांधी निरुत्तर हो जाते हैं.

बेटी ने दी मुखाग्नि

साबरमती से लौटकर शुक्ल अपने गांव सतबरिया नहीं गए, वे उसी साहू के मकान में चले गए, जहां गांधी रहा करते थे. उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था. 54 वर्ष की उम्र में 20 मई 1929 में मोतिहारी में चम्पारण के राजकुमार की मृत्यु हो गई. मृत्यु के समय उनकी बेटी देवपति वहीं थी. मृत्यु के पूर्व शुक्ल ने अपनी बेटी से ही मुखाग्नि दिलवाने की इच्छा जाहिर की. मोतिहारी के लोगों ने अंतिम संस्कार के लिए चंदा इकठ्ठा किया और मोतिहारी में रामबाबू के बगीचे में शुक्ल का अंतिम संस्कार हुआ.

और जब एक दुश्मन ने दुश्मन की याद की याद में दम तोड़ दिया……

चम्पारण के बेलवा कोठी में एक अंग्रेज अधिकारी था. नाम था ऐमन. वही, जो राजकुमार शुक्ल का इतना बड़ा विरोधी था कि उसने राजकुमार शुक्ल को हर तरीके से बर्बाद कर दिया. धन-संपदा से विहीन कर दिया और हर मौके को तलाश कर शुक्ल को प्रताड़ित किया. जब उसका दिल नहीं भरा तो उसने शुक्ल को मछली मारने के जुर्म में जेल भिजवा दिया.

लेकिन जब शुक्ल की मृत्यु की सूचना ऐमन को मिली तो वह स्तब्ध रह जाता है. उसके मुंह से बस इतना ही निकलता है कि चंपारण का अकेला मर्द चला गया. वह तुरंत अपने चपरासी को बुलाकर उसे 300 रुपये देकर कहता है कि ‘शुक्ल के घर पर जाओ और श्राद्ध के लिए पैसा देकर आओ. इस मर्द ने तो सारा काम छोड़कर देश सेवा और गरीबों की सहायता में ही अपने 25 वर्ष लगा दिए. रहा-सहा सब मैंने उससे छीन लिया. अभी उसके पास होगा ही क्या ? चपरासी हाथ में रुपये लेकर हक्का-बक्का ऐमन का मुंह देखता रह जाता है. कुछ क्षण बाद वह बोलता है कि साहब वह तो आपका दुश्मन था. उसकी बात काटते हुए ऐमन बोलता है,’ तुम उसकी कीमत नहीं समझोगे ? चंपारण का वह अकेला मर्द था जो 25 वर्षों तक मुझसे लड़ता रहा.’

शुक्ल के श्राद्ध में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिन्हा, ब्रजकिशोर प्रसाद आदि दर्जनों नेताओं के साथ ऐमन भी वहां मौजूद रहता है. राजेंद्र बाबू कहते हैं, ‘अब तो आप खुश होइए ऐमन, आपका दुश्मन चला गया.’ ऐमन अपनी बात दुहराता है, ‘चंपारण का अकेला मर्द चला गया. अब मैं भी ज्यादा दिन नहीं बचूंगा.’ चलते-चलते ऐमन शुक्ल के बड़े दामाद को अपनी कोठी पर बुलाता है. वह मोतिहारी के पुलिस कप्तान को एक पत्र देता है जिसके आधार पर शुक्ल के दामाद सरयू राय को पुलिस जमादार की नौकरी मिलती है. ऐमन को राजकुमार शुक्ल की मृत्यु का ऐसा सदमा लगता है कि वह भी कुछ महीने बाद दुनिया से विदा हो जाता है.

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