गोपालगंज : रहस्यमयी मंदिरों का कहलाता है जिला, हर मंदिर के बनने की अनोखी है कथा!

Gopalganj All Temples Stories: थावे के लछवार स्थित दुर्गा मंदिर में आने वाले भक्तों की हर पीड़ा दूर हो जाती है. हर साल नवरात्र के मौके पर यहां स्थित दुर्गा मंदिर में दूर दराज से भक्त आते हैं. कहा जाता है कि यहां आने वाले भक्तों को मां की असीम कृपा प्राप्त होने के साथ ही उनके दुख व रोग भी नष्ट हो जाते हैं. यहीं कारण है कि एतिहासिक लछवार धाम को यहां प्रेत बाधा से मुक्ति का धाम भी कहते हैं।

भूत प्रेतों को भगाने के मशहूर लछवार धाम

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शारदीय नवरात्र में तो यहां अजब नजारा देखने को मिलता है. भूत प्रेतों से मुक्ति पाने के लिए कहीं औरतें जोर-जोर से सिर हिलाती हैं तो कहीं पेड़ पर झूला झूलती हैं. ऐसी मान्यता है कि यहां के मिट्टी के स्पर्श मात्र से प्रेतात्माएं शरीर छोड़ देती हैं. यहां के बाबा द्वारा दिया जाने वाला भभूत भी काफी महत्व रखता है. यह धारणा इतनी प्रचलित है कि आसपास के जिलों के अलावा यूपी व नेपाल से भी भारी संख्या में महिला, पुरुष व बच्चे लक्षवार धाम आते है. लछवार मंदिर के बारे में स्थानीय लोग बताते हैं कि पूर्व में यह देवी स्थान गांव के पश्चिम दिशा में स्थापित था.

लगभग सौ साल पूर्व नारायण टोला सिंहपुर निवासी बाबा कल्लू पाण्डेय को देवी (Gopalganj All Temples Stories) ने दर्शन दिया और कहा कि मेरे इस स्थान को गांव के पूरब दिशा में ले चलो. इसके बाद बाबा ने नारायणपुर पंडित टोला के पूरब (लक्षवार धाम) में देवी के स्थान को अपने ही जमीन में स्थापित किया और देवी का पिंड रख, एक कोठरी बनाकर रहने लगे. इसी बीच लोग देवी स्थान के दर्शन के लिए इस स्थान पर आने लगे और कई असाध्य रोग व प्रेतात्माओं से मुक्ति मिलने लगी. यह बात धीरे-धीरे फैलती गयी. लछवार धाम में नवरात्र के छठें दिन से विशेष पूजा अर्चना की जाती है. कहा जाता है कि सप्तमी व अष्टमी को यहां आने वाले भक्तों को उनकी तमाम समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है. लछवार धाम जिला मुख्यालय से बारह किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम दिशा में गोपागलंज-मीरगंज मुख्य मार्ग पर स्थित है.

थावे का ऐतिहासिक दुर्गा मंदिर : इस मंदिर में देवी मां की पूजा से पहले क्यों की जाती है उनके इस भक्त की पूजा

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बिहार के गोपालगंज में ऐतिहासिक थावे का दुर्गा मंदिर (Thave Durga Temple) देश के 52 शक्तिपीठों में से एक है. इस मंदिर के पीछे एक प्राचीन किंतु रोचक कहानी है. जनश्रुतियों के मुताबिक एक समय यहाँ हथुआ के राजा मनन सिंह का राज्य था. इसी राज्य में मां भवानी के महान भक्त रहशु भगत जंगल में रहकर खेती-बारी करता था. दिन भर मां भवानी की आराधना में भी लगा रहता था. मान्यताओं के मुताबिक, मां का यह भक्त बाघ के गले में विषैले सांप की रस्सी बनाकर धान की दवरी करता था. रहशु भगत के इन कारनामें की चर्चा जैसे ही राजा मनन सिंह को लगी, उन्होंने मां के इस भक्त को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया. बंदी बने रहशु से राजा ने मां भवानी को बुलाने का आदेश दिया. रहशु भगत ने मां की पूजा अर्चना शुरू कर दी. भक्त के आह्वाहन पर चारों तरफ काले बादल छा गए. हर तरफ तेज आंधी पानी होने लगा. मां के परम भक्त रहशु भगत के आह्वाहन पर देवी मां कामरूप कामख्या से चलकर पटना के पटन और सारण के आमी होते हुए गोपालगंज के थावे पहुंची. मां के प्रकट होते ही रहशु भगत का सिर फट गया और मां भवानी का हाथ सामने प्रकट हुआ. मां के प्रकटट होने पर रहशु भगत को जहां मोक्ष की प्राप्ति हुई, वहीं मां के प्रकाश से घमंडी राजा मनन सिंह का सबकुछ खत्म हो गया.

यहाँ और बिहार के अलावा नेपाल, बंगाल और झारखंड से भी लोगों का आने का सिलसिला लगा रहता है. यहां नवरात्र में पशु बलि देने की भी परम्परा है. लोग मां के दरबार में खाली हाथ आते हैं, लेकिन मां के आशीर्वाद से भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है.

देवी ने जहाँ दर्शन दिये, वहां एक भव्य मंदिर है जो माता थावेवाली के मंदिर के तौर पर विख्यात है. थोड़ी ही दूरी पर रहषु भगत का भी मंदिर है. मान्यता यह भी है कि जो लोग माता थावेवाली के दर्शन के लिए आते हैं, वे रहषु भगत के मंदिर में भी जरूर जाते हैं. इसके बिना उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है. इस मंदिर के समीप ही मनन सिंह के भवनों का खंडहर आज भी मौजूद है.

माँ बगलामुखी मंदिर, गोपालगंज

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यह मंदिर बगलामुखी (Maa BanglaMukhi in Gopalganj) के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है, जो गोपालगंज से 15 किलोमीटर दूर कुचायकोट में स्थित है. हिंदू धर्म में, बगलामुखी दस महाविद्याओं (महान ज्ञान) में से एक हैं. बगलामुखी देवी, भक्त की गलतफहमियों और भ्रम की स्थिति को दूर करती है. बागला` नाम मूल संस्कृत मूल` वल्गा` का अपभृंश है. माता सुनहरे रंग की है और उसका कपड़ा पीला है. वह पीले कमलों से भरे अमृत के सागर के बीच में एक स्वर्ण सिंहासन में विराजमान है और एक अर्धचंद्राकार चंद्रमा उसके सिर को सुशोभित करता है. उन्हें अपने दाहिने हाथ में एक क्लब (Gopalganj All Temples Stories) पकड़े हुए दिखाया गया है और जिसके साथ उसने अपने बाएं हाथ से अपनी जीभ को बाहर निकालते हुए दानव को पीटते हुए. इस छवि को कभी-कभी `स्तम्भन` के प्रदर्शन के रूप में दर्शाया जाता है, जो किसी के दुश्मन को चुप कराने के लिए अचेत या पंगु बना देती है. यह स्थिति उन वरदानों में से एक है जिसके लिए बगलामुखी के भक्त उसकी पूजा करते हैं.

द्वापरयुग से स्थापित हैं गोपालगंज में भुवनेश्वर नाथ

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गोपालगंज के कुचायकोट प्रखंड मुख्यालय से 17 किमी पश्चिम स्थित गरेयाखाल में भगवान शंकर का भुवनेश्वर नाथ मंदिर स्थित है. भगवान भुवनेश्वर का दर्शन करने के लिए विशेषकर सावन के महीने में आसपास के जिलों सहित उत्तर प्रदेश से हजारों श्रद्धालु यहाँ आते हैं. प्रत्येक शिवरात्रि एवं सावन की सोमवारी पर जलाभिषेक के लिए पूरे दिन भर भक्तों की लंबी कतार लगती है. वहीं,फाल्गुनी शिवरात्रि को दो दिवसीय मेला भी लगता है. इस दौरान धतूर, बैर, बेलपत्र तथा दूध से भगवान शंकर का अभिषेक किया जाता है.

मंदिर के पुजारी के अनुसार के अनुसार यह शिवलिंग द्वापर युग का है. अंग्रेजों के शासन काल के पहले वर्तमान में स्थित मंदिर के जगह पर जंगल झाड़ियां उपजी हुई थी. उसके बाद किसानों ने यहाँ पर धान व गेंहू की फसल का भंडारण करना शुरु किया. कुछ सालों बाद जब यहाँ के दौरान एक किसान फावड़ा से (Gopalganj All Temples Stories) खुदाई कर रहा था, तभी उसके फावड़े के किसी कठोर वस्तू से टकराने की आवाज हुई. जब उसने वहां की मिटटी हटाई तो उसे, शिवलिंग दिखा. धीरे धीरे यह बाात पूरे गांव में फैल गई और लोगो ने यहाँ पूजा अर्चना शुुरु कर दी. फावड़े के चोट का निशान आज भी शिवलिंग पर दिखाई पड़ता है. बाद में ग्रामीणों ने इस जगह पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया.

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