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हरियाणा

तांगा चलाने वाले पिता ने देखा बेटी के हॉकी खेलने का सपना, रानी ने ओलंपिक में फहरा दिया तिरंगा

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टोक्यो ओलंपिक में इस बार महिला हॉकी टीम की चर्चा हर किसी की जुबां पर रही, महिला हॉकी टीम ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सेमीफाइनल में जगह बनाई। ओलंपिक इतिहास में यह पहला मौका था जब हमारी महिला हॉकी टीम सेमीफाइनल में पहुंची हो, हालांकि महिला हॉकी खिलाड़ियों का सफर सेमीफाइनल के बाद खत्म हो गया।

टीम की जीत में सभी खिलाड़ियों का योगदान रहा जिसमें अमृतसर की गुरजीत कौर के सिर जीत का सेहरा बंधा तो वहीं टीम की कप्तान रानी रामपाल का नाम भी छाया रहा। आज हम रानी रामपाल के अब तक के सफर और उनके संघर्ष के बारे में आपको बताएंगे कि आखिर कैसे हरियाणा के एक छोटे से गांव से निकलकर रानी ने ओलंपिक तक का सफर तय किया।

तांगा चलाने वाले पिता ने देखा बेटी के हॉकी खेलने का सपना

हरियाणा में शाहाबाद की रहने वाली रानी रामपाल की हॉकी की शुरूआत उनके पिता के देखे सपने के साथ शुरू हुई।  रानी के पिता माजरी मोहल्ले में तांगा चलाते थे इस दौरान वह अक्सर महिला हॉकी खिलाड़ियों को देखते थे औऱ उन्हें देखकर अपनी बेटी के हॉकी खेलने का सपना देखने लगे।

इसी सपने को साकार करने के लिए एक दिन वह अपनी 6 वर्षीय बेटी रानी को एसजीएनपी स्कूल के हॉकी मैदान में कोच बलदेव सिंह के पास लेकर गए और यहां से रानी का सफर शुरू हुआ।

बेटी इस्तेमाल करती है पिता का नाम

रानी अपने नाम के पीछे अपने पिता का नाम पूरी शान से लगाती है। अर्जुन व भीम अवार्ड से सम्मानित हो चुकी रानी कहती है कि मेरे पिता ने तमाम मुश्किलों के बावजूद मेरे हॉकी खेलने का सपना देखा और मेरे सपनों को उड़ान दी। रानी ने खेलते हुए 2020 में वर्ल्ड गेम्स एथलीट ऑफ द ईयर का खिताब भी अपने नाम किया।

14 साल की उम्र में खेली अंतरराष्ट्रीय स्तर पर

रानी ने 14 साल की उम्र में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी खेली और इस दौरान वह इस स्तर पर डेब्यू करने वाली सबसे छोटी उम्र की खिलाड़ी भी बनी। वहीं 15 साल की उम्र में रानी ने विश्व महिला कप की सबसे छोटी खिलाड़ी रही। रानी के उस समय के दमदार खेल की बदौलत भारत ने हॉकी जूनियर विश्व कप में कांस्य पदक अपने नाम किया।

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