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हरियाणा

बजरंग पूनिया : हरियाणा का वो पहलवान जो जिस अखाड़े में उतरा वहां फहराया तिरंगा

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टोक्यो ओलंपिक में हमारे पहलवान हर दिन दुनिया के सामने देश की मिट्टी और तिरंगे का मान बढ़ा रहे हैं. शुक्रवार की सुबह चारों तरफ बजरंग…बजरंग गूंजने लगा क्योंकि पहलवान बजरंग पूनिया ने ओलंपिक में अपने क्वार्टर फाइनल मुकाबले में ईरान के पहलवान को धूल चटा दी.

बजरंग ने मुकाबला 2-1 से जीतकर सेमीफाइनल में जगह बना ली है.

बजरंग पूनिया 65 किग्रा भारवर्ग में देश के ही नहीं, दुनिया के दिग्गज पहलवान बनकर उभरे हैं. एक समय था जब खेल-खेल में पिता की इच्छा पूरी करने के लिए कुश्ती को चुनने वाले बजरंग पर आज देश के सपनों को पूरा करने का दारोमदार है।

गांव के कुश्ती अखाड़े से लेकर टोक्यो ओलंपिक की रिंग में उतरने तक बजरंग तमाम संघर्षों से गुजरे और चुनौतियों को पार किया. बजरंग ने भी छोटे-छोटे दंगलों से होते हुए आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना झंडा फहराया है।

कुश्ती खेलते देख पिता ने लड़वाया दंगल

बजरंग पूनिया किसान परिवार से आते हैं और बचपन से ही गांव में कुश्ती और कबड्डी का माहौल रहा. बजरंग शुरू से ही कुश्ती खेलना अधिक पसंद करते थे।

एक दिन पिता ने कुश्ती खेलते हुए देखकर उन्हें दंगलों में लड़ना शुरू करवाया और देखते ही देखते उनका कुश्ती करियर शुरू हो गया. बजरंग गांव में मास्टर विरेंद्र के अखाड़े में ट्रेनिंग लेने लगे।

खुद को साबित कर पहुंचे छत्रसाल स्टेडियम

2007 में गांव से जब बजरंग दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम पहुंचे तो वहां जगह खाली नहीं होने के चलते उन्हें दाखिला नहीं मिला था। इसके बाद 2008 में बजरंग दिल्ली में स्कूली राष्ट्रीय कुश्ती प्रतियोगिता में हरियाणा की तरफ से खेलने अखाड़े में उतरे और जूनियर वर्ग में सभी को चित्त कर दिया. उनको कुश्ती करते देखकर छत्रसाल स्टेडियम के प्रशिक्षक रामफल ने उन्हें स्टेडियम बुला लिया जहां से बजरंग का नया सफर शुरू हुआ।

जिस अख़ाड़े में उतरे वहां फहराया तिरंगा

बजरंग ने पहली बार 2010 में देश के बाहर कुश्ती खेली और इस दौरान उनके मन में कई तरह के संशय थे। इसके बाद 2011 में उन्होंने सब जूनियर विश्व चैंपियनशिप में सोना जीत। बजरंग के प्रशिक्षक रामफल कहते हैं कि बजरंग ने कभी भी असुविधाओं को अपनी कुश्ती में रोड़ा नहीं बनने दिया और मेहनत करते रहे।

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