पेट की भूख से मजबूर दीपिका ने 14 बरस की उम्र में उठाया धनुष, आज दुनिया पर कर रही राज

बेटियां, अगर ठान लें तो वह क्या नहीं कर सकती, बेटियां एक बार के लिए असंभव को भी छूने की कोशिश कर सकती है। आज हम उस बेटी की आपको कहानी बताने जा रहे हैं जिसका नाम सुनते ही आज हर भारतीय गर्व महसूस कर रहा है।

हम बात कर रहे हैं भारतीय तीरंदाज़ दीपिका कुमारी की जिन्होंने हाल में पेरिस आयोजित तीरंदाजी विश्वकप में तीन गोल्ड मेडल जीतकर वर्ल्ड रैंकिंग में पहले पायदान पर पहुंच गई हैं।

दीपिका ने अपनी मेहनत और लग्न से आज अपने परिवार का आर्थिक और सामाजिक दर्जा ऊंचा किया है, वह अपने पिता का मान बनी है तो मां का गुरूर….आइए जानते हैं दीपिका की कहानी और कैसा रहा उनका सफर।

ऑटो रिक्शा में हुआ था दीपिका का जन्म

झारखंड में पैदा हुई दीपिका ने 14 सालों के सफर के बाद आज इस मुकाम पर पहुंची है। दीपिका के पिता शिव नारायण महतो ऑटो चलाते हैं और मां गीता एक मेडिकल कॉलेज में 500 रूपये महीने के वेतन पर ग्रुप डी कर्मचारी है.

दीपिका ने अपने परिवार में बचपन से ही आर्थिक तंगी झेली है। दीपिका के पिता शिव नारायण बताते हैं कि दीपिका के जन्म के दौरान उसकी मां अस्पताल भी नहीं पहुंच पाई, मेरे चलते ऑटो में ही दीपिका का जन्म हुआ।

बांस के बने धनुष बाण से की तीरंदाजी की शुरूआत

दीपिका ने 14 साल की उम्र में पहली बार धनुष-बाण देखा जो बांस के बने थे। दीपिका अब अक्सर कहती है कि जब उन्होंने धनुष-बाण उठाया तो इस खेल ने ही मुझे चुना।

तीरंदाजी की शुरूआत को लेकर दीपिका बताती है कि 2007 में मेरी नानी के घर जाने के दौरान मेरी ममेरी बहन ने मुझे अर्जुन आर्चरी एकेडमी के बारे में बताया।

दीपिका बताती है कि मुझे जब पता चला कि एकेडमी में सबकुछ फ्री है और रहना खाना भी मिलता है तो मैंने इस बारे में मेरे पिता से बात की लेकिन उम्मीद के मुताबिक निऱाशा हाथ लगी। दीपिका के पिता ने उन्हें घर से इतनी दूर जाने से मना कर दिया।

दीपिका की जिंदगी में नई चुनौतियों का आगमन

दीपिका के पिता के मना करने के बाद भी वह रांची से लगभग 200 किलोमीटर दूर खरसावाँ आर्चरी एकेडमी पहुंच गई। एकेडमी में दीपिका की शुरूआत अच्छी नहीं हुई क्योंकि वहां उन्हें खारिज कर दिया गया।

इसके बाद दीपिका ने 3 महीने का समय मांगा और मेहनत कर खुद को साबित कर दिखाया। एकेडमी के दिनों के बारे में दीपिका बताती है कि वह दिन बेहद मुश्किलों भरे थे, हमें नहाने के लिए नदी पर जाना होता था, जंगली जानवरों का खतरा हर समय बना रहता था।

दीपिका की जिंदगी में द्रोणाचार्य की एंट्री

2008 में जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप के दौरान दीपिका की मुलाक़ात टाटा आर्चरी एकेडमी के कोच धर्मेंद्र तिवारी से हुई। दीपिका के मुताबिक धर्मेंद्र तिवारी ने उन्हें टाटा आर्चरी एकेडमी तक पहुंचाया। आपको बता दें कि धर्मेंद्र तिवारी वर्तमान में दीपिका के कोच हैं.

दीपिका को दो बार ओलंपिक से निराशा हाथ लगी फिलहाल दीपिका टोक्यो ओलंपिक की तैयारियों में जुटी है। बीते 13 सालों में दीपिका ने कई विश्व कप प्रतियोगिताओं में 9 गोल्ड मेडल, 12 सिल्वर मेडल और 7 ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किए हैं और परिवार का स्तर भी उठाया है। इसी दौरान बीते साल दीपिका ने तीरंदाज अतानु दास से शादी भी की।

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