शहीद चंदन सिंह की अमर कहानी- कारगिल युद्ध में निभाई थी बड़ी भूमिका

Amar Shahid Chandan Singh Dhod in Sikar: अमर शहीद चंदन सिंह, खाखोली,धोद सीकर।
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मैदान-ए-जंग का निडर खिलाड़ी,
सारे उसने जंग लड़े।
पांच वर्ष की सेवा अवधि,
तीन वर्ष तो लड़े ही लड़े।

शहीद की बहादुरी की संघर्ष भरी कहानी।
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दोस्तों नमस्कार।
दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसे अमर शहीद फौजी की कहानी सुना रहा हूं, जिसको सुनकर आप भी आश्चर्यचकित रह जाएंगे। वह बचपन में इतना नटखट था कि वह किसी को भी अपनी हरकतों से बस में कर लेता था। एक बार उसके गुरुजी घर पर आए, तो गुरु जी को कुर्सी पर बैठा दिया। लेकिन दूसरे दिन स्कूल में जाकर वह गुरुजी की कुर्सी पर बैठगया। गुरुजी ने डांटा तो उसने कहा कि आप भी हमारे घर आकर कुर्सी पर बैठे थे, तो मैं भी बैठ गया। इस प्रकार उनकी संघर्ष भरी कहानी नीचे विस्तार से दर्शाई गई है।

परिवार और परिचय।
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सीकर (Sikar) जिले के धोद तहसील के खाखोली गांव के रहने वाले शहीद चंदन सिंह के बड़े भाई मदन सिंह ने खुशबू जी से बात करते हुए उनके जीवन की संघर्ष भरी कहानी को विस्तार पूर्वक साझा किया। मदन सिंह जी ने बताया की मैं आर्मी से सेवानिवृत्त हुआ हूं। लड़ाई के टाइम मैं कारगिल के कूपवाड़ा सेक्टर में था, और चंदन सिंह उड़ी सेक्टर में ड्यूटी को अंजाम दे रहे थे। उन्होंने बताया कि मेरे दादाजी, मेरे नानाजी, मेरे मामा जी सभी फौज में थे। फौज में होना हमारे लिए गर्व की बात है।
चंदन सिंह बहुत ही दिमाग वाला लड़का था। वह किसी बात को बहुत जल्दी से पकड़ता था। होशियार लड़का था। उसकी पांच वर्ष की सर्विस में वह तीन वर्ष लड़ाई के मैदान में रहा। जहां भी लड़ाई होती उसमें सबसे पहले जाना पसंद करता था। वह निडर था। वह हमेशा क्यू आर टी अर्थात क्विक रिएक्शन टीम में रहता था।
एक बार जब वह दसवीं क्लास में था तो बाहर खेलने के लिए गया। एक अध्यापक ने कहा कि तुम फेल होवोगे। यदि पास हुए तो मैं तुम्हारी टांग के नीचे से निकल जाऊंगा। चंदन सिंह पास हो गया, और क्लास में सबके सामने अध्यापक के पास में जा कर बोला कि आओ मास्टरजी मेरी टांग के नीचे से निकलो। वह एक निडर किस्म का लड़का था।उसके कुछ दिन ही बाद चंदन सिंह सेना में भर्ती हो गया।

शहीद होने के बाद।
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बड़े भाई मदन सिंह ने बताया कि रात को 10:00 बजे मेरे पास चंदन सिंह की यूनिट का एक जवान आया और उसने पूछा कि आप के भाई का क्या नाम है, कौन सी यूनिट में है तो मैंने उसको बता दिया।उसने कहा कि कल आप घर पर छुट्टी जाओगे। मदन सिंह ने कहा कि मैं तो नहीं जाऊंगा। दूसरे दिन सुबह मेरे पास एक समाचार आया कि राजोरी तक आपको गाड़ी छोड़ेगी और आगे आप अपनी सूझ बूझ से जाओगे। Amar Shahid Chandan Singh
आगे आगे घर पर मैं पहुंच रहा था, और पीछे पीछे मेरे भाई चंदन सिंह का शहीद शरीर आ रहा था। मुझे भी सीकर तक छोड़ने के लिए दो जवान आए थे। मुझे राजौरी मेंही मालूम पड़ गया था। पूरे गांव को कलेक्टर साहब ने सूचित कर दिया था लेकिन मेरे परिवार को किसी ने नहीं बताया। चंदन सिंह का जन्म 1976 में हुआ था, और 23 वर्ष की उम्र में 1999 में वह शहीद हो गए थे। कुछ दिन बाद में शादी करने का विचार था, लेकिन शादी करने से पहले ही वह शहीद हो गए।

शहीद स्मारक।
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सरकार ने घर के पास में ही सवा बीघा जमीन शहीद स्मारक हेतु आवंटित की, साथ में डेढ़ लाख रुपए शहीद स्मारक हेतु दिए। लेकिन खर्चा सात लाख से ऊपर हुआ जो परिवार को वहन करना पड़ा। छोटे भाई ने बताया कि हम तीन भाई थे। मैं रेलवे में सर्विस करता हूं। जब भी छुट्टी से वापस जाता हूं,तो चंदन से पूछके जाता हूं कि मैं जारहा हूं। मैं उसी की बदोलत नौकरी लगा हूं। मुझे शहीद कोटे से ही रेलवे में नौकरी मिली है। हमारा पूरा परिवार उसी के सहारे पर है।
चंदन सिंह के पिता जी का नाम सुगन सिंह जी था जब उनकी पोस्टिंग कोटा थी, उस समय चंदन सिंह का जन्म हुआ था। मां और भाभी ने भी अपनी आप बीती तथा बचपन की बातें बताइ।भाभीजी ने बताया कि जब मैं शादी हो कर आई थी, उस वक्त चंदन सिंह ढाई वर्ष का था। वह निडर होकर लड़ाई लड़ता था। जब उसको मोर्चे से बाहर निकलना नहीं बताया तब भी वह बाहर निकला और छद्म युद्ध का शिकार हो गया। उसके माथे में तथा छाती में सात गोलियां लगी थी।

अपने विचार।
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सरहद का वह सिपाही था,
कफन बांध के निकला था।
निडरता उसके खून में थी,
चेहरा हमेशा खिलता था।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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