100 वर्षीय मां को बेटे ने कांवड़ से करवाई लोहागर्ल की यात्रा, 25 घंटे में तय किया 55 KM का सफर!

Sikar: श्रवण कुमार की कहानी तो पढ़ी ही होगी, जिसमें वह अपने बुढ़े और नेत्रहीन माता-पिता को यात्रा कराता है, मगर राजा दशरथ के एक तीर से वह अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाता। खैर, वह दृश्य और वह अंश बेहद इमोशनल है, जिसे हम सभी ने जरूर देखा या पढ़ा होगा। लेकिन ऐसा ही एक श्रवण कुमार राजस्थान (Rajasthan) में भी है। यह बेटा सीकर (Sikar) के सांवलोदा धायलान का रहने वाला है जो मां उगम कममवर को कांवड़ यात्रा (in sikar Yatra by kanwar taking mother) करवा रहा है। मां की उम्र 100 साल के करीब है और वह अपने जीवन में लोहागर्ल (lohagarh ) की 15 यात्राएं कर चुकी हैं। अब जब मां का मन लोहागर्ल (lohagarl) की यात्रा करने का फिर मन किया तो वह जाने में असमर्थ दिखीं क्योंकि अब उनकी उम्र उनकी इच्छा के बीच अवरोध बन कर खड़ी हो गई। मां ने जब इस इच्छा को बेटे सुमेर सिंह को बताया तो बेटे ने मां को लोहागर्ल की यात्रा कराने का संकल्प उठाया।

Lohagarh Yatra by Kanwar

सुमेर ने मां को यात्रा कराने के लिए पहले एक कांवड़ तैयार की जिसे आप ऊपर देख सकते हैं, फिर बेटे ने इसमें एक पीढ़ा लगाया ताकि मां अच्छे से बैठ सके, और इसके बाद वह मां को उस कांवड़ में बैठाकर परिवार सहित लोहागर्ल की यात्रा कराने के लिए निकल पड़ा। जहां सुमेर ने मां को तीर्थ स्नान करवाया और वहां से गांव तक की यात्रा मां को कावंड़ (sikar)पर बिठाकर कंधे से पूरी करवाई। यह पूरी यात्रा 54 किलोमीटर की रही, इस सफर में मां उगम का पोता-पोतियों ने भी पूरा साथ दिया। भजनों और भगवान शिव के जयकारों के बीच दादी की इस इच्छा को बड़ी ही धूमधाम से पूरा किया गया।

sikar maa

इस बीच मां उगम पूरी कांवड़ यात्रा के दौरान बेहद भावुक नजर आईं। वह दामन फैलाकर बेटे और पोते-पेतियों के लिए दुआ करती दिखीं उनकी आंखें नम थी। वहीं बेटे सुमेर का कहना है कि जिंदगी में माता-पिता का कर्ज कभी नहीं उतारा जा सकता। अगर उनके लिए कुछ करने का मौका मिल रहा है तो यह सौभाग्य की बात है। उन्होंने साथ गाय और माताओं की होतीं दुर्दशा के प्रति दुख भी जताया तथा निवेदन किया कि माओं को बचाने के लिए हर प्रयास किया जाना चाहिए, इन्हें बचाना तथा सेवा करना हमारा कर्तव्य है।

इसके अलावा सुमेर सिंह पिता की भी प्रतिमा स्थापित करवा चुकी हैं। वह बताते हैं कि चार साल पहले जब वह इराक से लौटे तो उन्होंने खेती-बाड़ी करना शुरू किया। उनके पिताजी गोरसिंग गोगाीजी के भक्त थे, साल 2016 में उनके निधन के बाद जन सहयोग द्वारा गांव के मंदिर के नजदीक उनकी प्रतिमा भी स्थापित करवाई गई थी। सुमेर की तीन भाई और बहुएं भी खेती के साथ-साथ मां के पूरा ख्याल रखती हैं।

maa sikar

उगम कंवर की यह यात्रा 25 घंटे में समाप्त हुई थी, पोते पृथ्वी सिंह (sikar) ने कहा कि तीर्थ स्नान के बाद शनिवार शाम पांच बजे दादी को लेकर लोहागर्ल से गांव के लिए निकले थे,  रुक-रुककर चलते हुए  उन्होंने रविवार की शाम तकरीबन 6 बजे गांव के शिव मंदिर पहुंचकर यह यात्रा पूरी की। इस बीच उगम कंवर के पोते प्रेम सिंह, मोहन सिंह, पृथ्वी सिंह, जीवराज सिंह, महिपाल सिंह, कुलदीप सिंह, सुमग सिंह, भैरूं सिंह मांगू सिंह और रतन खीचड़ के साथ -साथ पोती- सोनिया, पूजा, अंकिता, शयन्ति कंवर और भतीजी सरदाकर कांवड़ यात्रा में मौजूद रहें, जिन्होंने दादी का पूरा ख्याल रखा।

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