समान नागरिक संहिता : वो गुब्बारा जिसमें सभी राजनीतिक दल हवा भरते हैं लेकिन उड़ाना कोई नहीं चाहता !

समान नागरिक संहिता यानि यूनिफार्म सिविल कोड, अयोध्या के राम मंदिर विवाद के बाद शायद सबसे बड़ा मुद्दा जिस पर सालों से दबे मुंह और कभी खुली बहस चल रही है। आप इसे एक गुब्बारा कह सकते हैं जिसमें समय-समय पर कोई हवा भरता है लेकिन उड़ाने की बात आते ही मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।

अब इस चर्चा को हवा दी है दिल्ली हाईकोर्ट की एक टिप्पणी ने जहां एक तलाक मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा है कि देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का यह सही समय है, सरकारों को इसके बारे में विचार कर जरूरी कदम उठाने के लिए कहा है।

बता दें कि मीणा जनजाति की एक महिला और उसके हिंदू पति के बीच तलाक मामले पर सुनवाई करते समय कोर्ट ने ऐसा कहा। कोर्ट जिस मामले में सुनवाई कर रहा था उसके मुताबिक मामले में पति हिन्दू मैरिज एक्ट के हिसाब से तलाक लेना चाहता है लेकिन पत्नी मीणा है ऐसे में उसका कहना है कि उस हिन्दू मैरिज एक्ट लागू नहीं होता है।

एक लाइन में समझें तो समान नागरिक संहिता का मतलब है कि भारत में सभी नागरिकों के लिए एक जैसा नागरिक कानून बने फिर चाहे वह किसी भी धर्म औऱ जाति के हों।

हालांकि इस कानून को अमलीजामा पहनाने की कवायदें सालों से चल रही है लेकिन सरकारों की कुछ अपनी राजनीतिक मजबूरियां के चलते यह कानून अभी जमीन पर नहीं उतर पाया है।

अब एक बार समान नागरिक संहिता सुर्खियों में है तो आइए जानते हैं कि आखिर क्या है यह कानून और पहली बार इस पर बहस कब शुरू हुई।

यूनिफॉर्म सिविल कोड क्या है?

संविधान के आर्टिकल 44 में किसी भी राज्य को सही समय पर सभी धर्मों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने का निर्देश भी दिया हुआ है। आसान शब्दों में कहें तो यूनिफॉर्म सिविल कोड देश के सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानून लागू करने की अपील करता है।

समान नागरिक संहिता (यूसीसी) अनिवार्य रूप से  पूरे भारत के लिए एक कानून बनाने का आह्वान करता है जिसमें सभी समुदायों के व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, गोद लेने जैसे मसले शामिल होते हैं।

वर्तमान में, विभिन्न कानून विभिन्न धर्मों के अनुसार हैं जैसे उदाहरण के लिए, हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम। हालांकि, इसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ को शामिल नहीं किया गया है और वह इस्लाम के धार्मिक ग्रंथों पर आधारित हैं।

फिलहाल यह कानून कहां अटका हुआ है?

समान नागरिक संहिता कानून सालों से राजनीतिक बहसों में उलझा हुआ है। अलग-अलग धर्मों के लोग इस कानून के लागू होने को लेकर अपने तर्क रखते हैं। देश में सत्ताधारी पार्टी भाजपा सालों से इस कानून की वकालत करती रही है जबकि कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर फिसलन वाली जमीन पर चलती है औऱ विरोधी तेवर दिखाती है।

शाहबानो केस में हुई पहली बार चर्चा

1985 में शाहबानो मामले में पहली बार यूनिफॉर्म सिविल कोड नाम उछला। सुप्रीम कोर्ट में तलाक के एक मामले में शाहबानो के पूर्व पति को गुजारा भत्ता देने का फरमान जारी किया।

इस मामले में कोर्ट ने आदेश दिया कि पर्सनल लॉ में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो ताकि बानो के पति को गुजारा भत्ता मिल सके। वहीं तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सरकार उस समय सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटा और संसद में एक बिल पास करवाया था।

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