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जिस्म बेचकर भरती थी अपने बच्चों का पेट, एक फोन ने बदली किस्मत, आज खाती है मेहनत की रोटी

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आज हम आपको एक ऐसी कहानी बताएंगे जिसका बचपन इतना संघर्षशील रहा और जिसकी कहानी सुनकर शायद आपकी आंखों में आंसू भी आ सकते हैं। हम बात कर रहें है महाराष्ट्र की रहने वाली टेलर नूतन की, जिनके माता-पिता मुंबई में रहकर अपने बच्चों को पालन पोषण किया करते थे। जब वह 10 साल की थी तब उनके माता-पिता ने उन्हें भी मुंबई में बुला लिया था। नूतन अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी।

पिता के नाम पर थे राक्षस

नूतन आगे बताती है कि 10 साल की उम्र में वह मुंबई आ गई थी। मुंबई आने के बाद उन्होंने अपने परिवार की सच्चाई के बारे में पता चला। नूतन बताती हैं कि उनके पिता उनकी मां के साथ गाली गलौज किया करते थे।

पिता शराब पीकर उनकी मां को मारा पीटा करते थे। साथ ही नूतन ने बताया कि उनके पिता ने उनकी मां को देह व्यापार के लिए भी धकेल दिया था। नूतन की मां अपने बच्चों का पालन पोषण करने के लिए देह व्यापार किया करती थी।

छोटी उम्र में हो गई शादी

नूतन की शादी बचपन में हो गई थी जिसके बाद उन्होंने अपनी मां के घर में देखा वहीं उन्हें ससुराल में देखने को मिला था। उनके पिता की तरह उनका पति भी नूतन के साथ मारपीट करने लग गया था। जल्द ही नूतन के बच्चा भी हो गया था, जिसके बाद उसके बच्चे ने भी नूतन के पति का दुर्व्यवहार सहा। नूतन का पति नूतन को देह व्यापार के लिए के लिए भी धकेलना चाहता था।

घर से मां ने निकाल दिया

एक रोज नूतन सभी चीजों से परेशान होकर अपनी मां के घर आ गई थी, लेकिन उनकी मां ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया, साथ ही उनकी मां ने कहा कि कभी वापस मत आना।

नूतन अपने घर वापस नहीं जाना चाहती थी, जिसके बाद उन्होंने स्टेशन पर रुक कर रात बिताई थी उनके बच्चे स्टेशन पर बेंच पर रात भर सोते रहे और नूतन अपने बच्चों की रखवाली करती रही थी।

एनजीओ ने बदली किस्मत

नूतन बताती हैं कि एक बार उनका परिचय पूर्णता एनजीओ के किसी व्यक्ति से हुआ था। उन्होंने नूतन को कहा था कि कभी मदद की जरूरत हो तो उन्हें फोन करें। स्टेशन पर रात बिताने के वक्त नूतन को याद आया कि उन्होंने स्टेशन से किसी का फोन मांग कर के एनजीओ में कॉल किया था। नूतन कहती हैं कि उस फोन के बाद उनकी पूरी जिंदगी बदल गई।

टेलरिंग का काम सीख चला रही है घर

नूतन कहती हैं कि उन्होंने एनजीओ के साथ काम करना शुरू कर दिया था। एनजीओ ने उनके बच्चों की पूरी जिम्मेदारी लेने का फैसला किया उनके बच्चों के पढ़ाई के खर्च से लेकर तमाम तरह के खर्चे पूर्णता एनजीओ उठा रहा था। वह कहती हैं कि उन्होंने टेलरिंग का काम सीख लिया था, वह आगे चलकर एक डिजाइनर बनना चाहती हैं। वे कहती हैं कि एनजीओ ने उन्हें खुद पर विश्वास करना और स्वतंत्र होना सिखाया।

कोई ना उठाएं मेरे बच्चो पर आंख

नूतन ने आगे कहा कि वह अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर सकती हैं। उनके बच्चों पर सवाल उठाने वाले लोगों को वह जवाब देती हैं कि मां होने के नाते बच्चों के लिए हर वक्त लड़ेगी।

अपने बच्चों को सुरक्षित और भविष्य को सुधारने के लिए वह दिन रात मेहनत करेगी। नूतन कहती है कि वह कामयाब होकर अपने साथ रेड लाइट एरिया की कई औरतों की किस्मत बदलना चाहती है।

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