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महाराष्ट्र

टोक्यो ओलंपिक में खेलने वाले प्रवीण जाधव की कहानी, लकड़ी से बने तीन-कमान से सीखी तीरंदाजी

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टोक्यो ओलंपिक इस समय पूरी दुनिया में चर्चा का विषय है। दुनिया भर से आए खिलाड़ी अपने देशों के लिए दमखम लगा रहे हैं। 23 जुलाई से शुरू हुए खेलों के इस महाकुंभ में 8 अगस्त तक ऐसी रौनक देखने को मिलेगी।

टोक्यो 2020 में भारत से कई एथलीट हिस्सा ले रहे हैं जिनमें मणिपुर की मीराबाई चानू देश के लिए चांदी लेकर आई हैं। इसके अलावा महाराष्ट्र के सतारा जिले के प्रवीण जाधव भी टोक्यो ओलंपिक में हिस्सा लिया लेकिन उनका सफर जल्दी खत्म हो गया।

प्रवीण जाधव अपने दूसरे राउंड में हारकर बाहर हो गए हैं. प्रवीण दूसरे राउंड में अमेरिका के ब्रैडी एलिसन से सीधे सेट्स में हारे। इससे पहले प्रवीण ने रूस के गलसन बज़ारझापोव को सीधे सेट्स में हराया था।

संघर्षों से भरी रही प्रवीण की कहानी

सतारा जिले का नाम रोशन करने वाले प्रवीण मजदूरी करने वाले माता-पिता के घर पैदा हुए जिनका आधा जीवन सार्दे गांव में नाले के किनारे बनी झुग्गियों में बीता। प्रवीण ने ऐसे दिन भी देखें हैं जब उन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता था। प्रवीण ने अपने लक्ष्य के आगे कभी भी गरीबी को बाधा नहीं बनने दिया। मेहनत और जज्बे के दम पर प्रवीण आज ओलंपिक में खेलने पहुंचे हैं।

8 साल की उम्र में बनाया लक्ष्य

प्रवीण 8 साल की उम्र से एथलेटिक्स में रूचि लेन लग गए लेकिन पैसों की तंगी के चलते वह कभी किसी खेल अकादमी में शामिल नहीं हो सके। आखिरकार बुलंद हौंसले वाले प्रवीण ने अपने गांव में ही लकड़ी के बने तीर कमान से तीरंदाजी का अभ्यास करने लगे।

22 की उम्र में वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर पदक

प्रवीण के ओलंपिक में जाने से पहले भी इस खेल में अपना जलवा बिखेर चुके हैं। 2016 में बैंकॉक में एशिया कप प्रतियोगिता में प्रवीण पहली बार भारत की तरफ से खेले और कांस्य पदक जीता। वहीं 2019 में उन्होंने सिर्फ 22 साल की उम्र में वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल अपने नाम किया।

गौरतलब है कि हाल में 13 जुलाई को पीएम मोदी ने टोक्यो ओलंपिक में जाने वाले हर एक एथलीट से बात कर मनोबल बढ़ाया था जिसमें प्रवीण जाधव भी शामिल थे।

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