काली माता धाम का अनोखा रहस्यमयी मंदिर जहाँ हर कोई नहीं जा सकता, चमत्कारी कल्प वृक्ष का रहस्य

भेड़ भेड़िया साथ में रहते,
मन में प्रेम सवाया।
माता तेरी लीला न्यारी,
किशनगढ़ बसाया।

भेड़ और शेर की लड़ाई और किशनगढ़ की बसावट की अनोखी कहानी।
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दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको अजमेर के पास किशनगढ़ की बसावट की एक अनोखी कहानी सुनाने जा रहा हूं जिसमें काली माता की छत्रछाया में किस प्रकार किशनगढ़ की नींव रखी गई थी। एक बार की बात है कि जोधपुर महाराज शिकार करते हुए अजमेर के पास से किशनगढ़ की पहाड़ियों में होते हुए निकल रहे थे, कि एक जगह पर भेड़ और शेर एक घाट पर पानी पीकर आपस में अठखेलियां कर रहे थे। बहुत देर तक महाराजा ने यह दृश्य देखा और विचार किया कि इस जगह में कुछ खास है।

इस जगह पर मैं एक नगर बसाऊंगा। प्रोग्राम के हिसाब से महाराजा अपने लवाजमें के साथ में उस जगह पर आ गए जहां पर नगर बसाने का विचार किया था। राजा ने वहां पर एक नगर बसाया उसका नाम रखा किशनगढ़। महाराजा जी देवी के बहुत बड़े भक्त थे। तो उन्होंने उस नगर में काली माता का मंदिर बनाया। मंदिर से लेकर किले तक सुरंग बनाई, जिसके द्वारा वह मंदिर में आया जाया करते थे।

बहुत समय निकल गया। कई राजा बदल गए। वहीं पर आसन दास जी महाराज अपनी कुटिया में रहते थे। बहुत से साधु महात्मा वहां पर आया जाया करते थे और अपनी संगत लगाया करते थे। एक बार एक राजा ने आसन दास जी महाराज से कहा कि महाराज जी मैं यहां पर एक महल बनाऊंगा। मेरे दो लड़के हैं। एक लड़के को यहां पर महल बना कर दूंगा। इसलिए आप यहां से दूसरी जगह पर जाकर रहना शुरू कर दो।

आसन दास जी महाराज को उनकी कही हुई बात बुरी लगी। और कहा कि आपके लड़के कहां पर हैं। तो उन्होंने कहा कि घूमने के लिए गए हैं तो संत महात्मा ने कहा कि वो नहीं आएंगे।

महात्मा जी ने अपने धूने की जलती हुई लकड़ी कपड़े की पोटली में बांधली, और तालाब के ऊपर चलते हुए दूसरी तरफ चले गए। और श्राप दिया कि आपका कभी वंश नहीं चलेगा। यहां पर कोई दूसरा आकर राज करेगा। और किशनगढ़ वासियों को भी श्राप दे दिया कि यहां पर दूसरा आएगा वह प्रोग्रेस करेगा। यहां के बाशिंदे कभी प्रोग्रेस नहीं करेंगे।
उसके बाद में महात्मा जी कहीं पर चले गए और किशनगढ़ वासियों के अंदर वही हुआ जो महात्मा जी ने श्राप दिया था। यहां पर कोई दूसरा आता है वह प्रोग्रेस करता है।लेकिन यहां पर रहने वाले केवल दाल रोटी का काम चलाते हैं। यहां के राजा का कोई वंश नहीं चला। यहां के राजा को अन्य किसी राजा का बच्चा गोद लेकर ही अपना राजपाट चलाना पड़ता है।

काली माता के मंदिर में एक वृक्ष का जोड़ा है। यहां पर जो भी कोई आता है अपनी मान्यता पूरी करके ही जाता है। किसी की भी आशा अधूरी नहीं रहती है। इस मंदिर के ऊपर काली माता की इच्छा के बगैर कोई नहीं आ सकता। यदि मन में शंका होगी तो अनेकों प्रकार की बाधाएं आएंगी और उसके बाद में क्षमा याचना करने पर ही वह ऊपर आ सकता है। मंदिर के चारों तरफ बहुत सुंदर पानी का तालाब है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है।

अनेक प्रकार की मान्यताओं के बारे में पूछने पर पुजारी जी महाराज कहते हैं, कि काली माता कभी लड़की के रूप में तो कभी सर्प के रूप में लोगों को दर्शन देती है। उनको रास्ता दिखाती भी है और जिसके मन में शंका हो उसका रास्ता रोकती भी है। उन्होंने कई किस्से भी सुनाएं, जिसमें किसी एक स्त्री के मन में शंका थी। वह अपने पति के साथ में मंदिर में आ रही थी लेकिन शंका होने की वजह से सर्पों ने उनका रास्ता रोक लिया। और फिर क्षमा याचना करने पर ही अंदर आने दिया।

बोलो काली माता की जय।

अपने विचार।
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कण-कण में भगवान है,
जो मन में हो विश्वास।
ईश्वर भी कहीं दूर नहीं,
है अपने अंदर भी वाश।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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