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अजमेर

राजस्थान का प्रसिद्ध कचोरा जिसे कहते है ‘कचोरी का बाप’, देखकर मुंह में आ जाएगा पानी

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ajmer nasirabad kachora

घटना तो घटती ही रहती है,
घटाने वाला चाहिए।
आज के समय सब कुछ बनता है,
बनाने वाला चाहिए।

ऐसी कचोरी जिसमें चार व्यक्तियों का पेट भर जाए।
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दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी कचोरी की कहानी सुनाने जा रहा हूं जो कचोरी से बहुत बड़ी साइज में है। जिसको कचोरी का बाप कह सकते हो, अर्थात कचौरा। जिसके खाने से एक साथ में चार व्यक्तियों का पेट भर जाए।

यह कहानी अजमेर (Ajmer) जिले के नसीराबाद (Nasriabad) कस्बे की है। नसीराबाद के सदर बाजार में श्रीमान कल्याण जी हलवाई की दुकान पर जब झलको की टीन गई तो वहां पर बन रही कचोरी को देखकर एक बार तो दंग रह गए लेकिन फिर उन्होंने बताया की इस प्रकार की एक कचोरी जैसी चीज आगरा के प्यारे लाल जी हलवाई बनाया करते थे। उन्हीं से सीख लेकर हमें भी हमारी दुकान पर यह बड़ी कचोरी बनानी शुरू की।

कल्याण जी ने कहा कि हमारी दुकान को आज 48 वर्ष हो गए हैं। हमने इस कचोरा को अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया अर्थात अनेक देशों के अंदर निर्यात किया है और कर रहे हैं। इसकी पूछ सभी जगह पर है।

कचोरी और कचोरे के मसाले में क्या अंतर है का जवाब देते हुए श्रीमान जी कल्याण भाई जी कह रहे हैं कि कचोरी के अंदर सीकी हुई दाल का प्रयोग होता है जबकि कचोरे के अंदर कच्ची दाल का प्रयोग होता है।

इसकी सप्लाई कहां-कहां होती है का जवाब देते हुए हलवाई साहब कह रहे हैं कि हम कोरियर के द्वारा, बस या ट्रेन के द्वारा या जो भी कोई साधन मिल जाए, उसके द्वारा पूरे राजस्थान क्या पूरे भारत में इस कचोरे की सप्लाई कर रहे हैं। कीमत के बारे में पूछने पर वह बताते हैं कि इसकी कीमत ₹140 एक पीस के हैं और वजन लगभग 650 ग्राम है जो कि चार या पांच आदमी भर पेट खा सकते हैं।

आप इसको बाहर भेजते हैं तो क्या खराब नहीं होता है का जवाब देते हुए वह कहते हैं कि हम पहले इसको पंखे के द्वारा ठंडा करते हैं। ठंडी होने के बाद में यह खराब नहीं होती है। जब गर्म रहती है तो वह भाप से इसमें पसीना आकर खराब होने का डर रहता है। लेकिन ठंडी होने के बाद में नहीं।

कौन-कौन यह काम करता है का जवाब देते हुए वह कहते हैं कि हम तीन भाई हैं हम तीनो भाई और हमारे बच्चे सब इस काम में लगे हुए हैं। इसलिए हम यह काम आगे भी करते रहेंगे। हम सब यह काम बड़े चाव से करते हैं। इसमें बोरियत या वजन जैसा कोई हम महसूस नहीं करते हैं, इसलिए हम इस काम को आगे भी करते रहेंगे।

अपने विचार।
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मथने से मक्खन मिले,
मन में खुशी अपार।
जब मंजिल मिल जाती है,
पूछे जग में हजार।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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