भानगढ़ का भू’तिया किला जहाँ तां’त्रिक के श्रा’प से बना भू’तों का गढ़, डरा’वनी कहानी

भानगढ़ कब उजड़ा कब किले की कहानी का विरेचन हुआ और कब भानगढ़ भव्य होकर भूतहा बना, आगे इसी का उल्लेख है।1573 में आमेर दरबार भगवंत दास ने अपने बेटे माधो सिंह के लिए इस भानगढ़ का निर्माण करवाया था।भानगढ़ के भू’तहा बनने की कहानी में महत्त्वपूर्ण ट्विस्ट राजकुमारी रत्नावती के समय आता है।रानी बेहद सुन्दर थी इलाके में सिंघिया नाम का एक तां’त्रिक रहता, सालिम सिंह की तरह वह भी शादी करना चाहता था।जो कि बिल्कुल सम्भव नहीं था। भानगढ़ में अगर हम भ्रमण करें तो पाएंगे कि आज भी वहां पंक्ति में कुछ खण्डहर निर्माण मिलेंगे, सम्भवतः कभी लंबा बाजार रहा हो, तो रानी के लिए एक दिन केश तेल लेने आयी दासी को छल से तां’त्रिक ने अभिमंत्रित तेल दे दिया लेकिन हतभाग कि रास्ते में शीशी गिर गयी वहीं टुकड़े चार हो गये।

लोक के अनुसार जिस शिला पर यह शीशी गिरी थी वह शिला तां’त्रिक की तरफ खींचने लगी और शिला के नीचे दबकर उस तां’त्रिक की मौ’त हो गई।कहते हैं कि अपनी मौत से पहले ही उस तां’त्रिक ने भानगढ़ को नष्ट करने का प्लान बना लिया था और इस नगर को श्रा’प दे दिया और किले के अंदर और परिधि में रहने वाले लोगों ने भानगढ़ छोड़ दिया।वह अब वीरान हो चुका था, कुलधरा की तरह।दोनों की अपना त्रासद अनुभव है लेकिन पर्यटकों के लिए अलग।

भानगढ़ के किला कब, कैसे भूतहा बना इसके पीछे के कारणों पर चर्चा की और इस बारे में हिन्दी के वरिष्ठ कवि कैलाश मनहर की चार पंक्तियाँ उल्लेखित करते चलें।

वे ‘अरे भानगढ़!’ शीर्षक संकलन में लिखते हैं कि-

भानगढ़ भव्य भी,भया’नक भी ; भानगढ़ हर घड़ी,अचानक भी

भानगढ़ प्यास में,नदी में भी ; भानगढ़ हाँ में भी नहीं भी

म’र गया मगध, वहाँ विचार नहीं था ; भानगढ़ उ’जड़ गया कि प्यार नहीं था

नगर में बने नृतकी महल से रात भर घुँघरूओं की आवाज आती रहती है।जब इसके पीछे शोध हुआ तो पाया गया कि यहाँ बड़ी मात्रा में चमगादड़ और तिलचट्टे हैं, जिनकी ध्वनियाँ सुनायी देती है।वैसे एक कथा के अनुसार भानगढ बालूनाथ योगी की तपस्‍या स्‍थल भी रहा,ये वे ही बालूनाथ थे जिन्होंने एक शर्त पर भानगढ के कि‍ले को बनाने की सहमति‍ दी कि‍ कि‍ले की परछाई कभी भी मेरी तपस्‍या स्‍थल को नहीं छूनी चाहि‍ए।

परन्‍तु राजा माधो सि‍ंह के वंशजों ने इस बात पर ध्‍यान नहीं दिया और कि‍ले का निर्माण ऊपर दिशा में जारी रखा तत्पश्चात एक दि‍न कि‍ले की परछाई तपस्‍या स्‍थल पर पड़ गयी।और इस घटना पर पर योगी बालूनाथ ने भानगढ़ को श्रा’प देकर ध्वस्‍त कर दि‍या, श्री बालूनाथ जी की समाधि अभी भी वहाँ पर मौजूद है।

भानगढ़ का किला चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ है।बरसात के मौसम में यहां की रौनक देखने को ही बनती है।भानगढ़ को दुनिया के सबसे डरा’वनी जगहों में से माना जाता है।आज भी यहां सूर्य उदय होने से पहले और सूर्य अस्त होने के बाद किसी को रुकने की इजाजत नहीं।कई फिल्म, शॉर्ट फिल्म आदि में इस किले को दिखाया गया है।

कुलधरा की तरह पैरानॉर्मल इंवेस्टिगेटर की टीम यहाँ भी गईं, टीम के कुछ लोगों ने यहाँ नकारात्मक ऊर्जा की उपस्थिति को स्वीकारा है तो कईयों के मुताबिक शोध ही सार्थकता है।बकौल पैरानार्मल सोसाइटी ऑफ इंडिया के प्रमुख गोविंद कुमार- “कोई भी जगह 40 दिन से ज्यादा बंद हो तो वहां नकारात्मक उर्जा का संचार होने लगता है। भानगढ़ का किला तो वर्षों से विरान रहा है ऐसे में नेगिटिव महसूस होना स्वभाविक है। वैसे जब हमने और हमारी टीम ने यहां जॉच पड़ताल की तो हमें ऐसा कुछ भी महसूस नहीं हुआ जिससे कहा जा सके कि भानगढ़ में कोई भू’त या आ’त्मा जैसी डराने वाली चीज मौजूद हो।

Add Comment

   
    >