राजस्थान का ऐसा रहस्यमयी मंदिर जो खुद ब खुद जमीन से हुआ प्रकट और नदी ने कर दिए दो भाग

राजाओं के राज में,
कला का था उत्तम स्थान।
कला दिखाई नटनी ने,
तो रख दिया गांव का नाम।

देवनारायण जी का मंदिर जमीन से प्रकट हुआ
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दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसे स्थान पर लिए चलता हूं। जहां का अद्भुत मंदिर और अद्भुत कला का संगम दो नदीयो के बीच में आपको देखने को मिलेगा।अलवर यात्रा पर निकली खुशबू से बात करते हुए मंदिर के मंत्री ने इस अद्भुत कहानी को बड़े सुंदर तरीके से बताया।

यह मंदिर कितना पुराना है।
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पंडित जी ने खुशबू से बात करते हुए बताया कि यहां पर बीस वर्ष पहले एक छोटा सा गुंबज दिखाई देता था। जो ब्रह्मा विष्णु महेश की कृपा से नदी के बहाव में पूरा मंदिर निकल आया।इस स्थान पर देव नाथ जी महाराज की मूर्ति और हनुमान जी की मूर्ति के साथ पूरा मंदिर था। जो सदियों पहले बनाया गया था। वहां पर साथ में संत महात्मा की समाधि, धुना और अन्य जो भी सामान था,वह सब वैसा का वैसा निकला।

दो नदियों का रहस्य क्या है।
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पंडित जी महाराज ने बात करते हुए बताया कि यह नदी पांडुपोल भरतरी होते हुए सभी देव स्थानों के बाद में जयपुर पहुंचती थी।तो अलवर महाराज जय सिंह ने अलवर के हिस्से का पानी लेने के लिए नदी को दो भागों में कर दिया। एक हिस्सा अलवर की तरफ मोड़ दिया और बांध बना दिया। दूसरा हिस्सा देव स्थानों पर होते हुए भरतपुर की तरफ निकल जाता है।

नदी की शुरुआत का उत्तर देते हुए पंडित जी कहते हैं कि यह तो सृष्टि की रचना के साथ में ही शुरू हुई थी। भरतपुर वालों ने अलवर वालों से कहा कि तुम को जरूरत हो तो रोक लो। तब से अब इस समय दोनों के पास आधा आधा जल का बंटवारा हुआ है।

नटनी का बारा।
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इस बात का जवाब देते हुए पंडित जी ने कहा कि जब इस गद्दी के ऊपर रूपनाथ जी महाराज विराजमान थे। तब उन्होंने अलवर नरेश से कहा कि मैं खेल दिखाना चाहता हूं। आपका आशीर्वाद चाहिए तो अलवर महाराज ने उसकी अनुमति दे दी । तो वहां पर दो पहाड़ियों के बीच में से सड़क भी जाती है और नदी भी निकलती है के ऊपर सूत का धागा बांधकर खेल दिखाया। जिसकी गोद में बच्चा भी था, लेकिन जैसे ही नटनी ने खेल खत्म कर नीचे आई, उसको दिल का दौरा पड़ा और वह खत्म हो गई। तब से इस गांव का नाम नटनी का बारा पड़ा है।

अन्य।
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नटनी के त्याग के कारण इस गांव का नाम नटनी का बारा पड़ा था , लेकिन इस समय देवनारायण जी के मंदिर की स्थापना के बाद में इसको देवस्थान भी कहते हैं। दो तीन हजार वर्ष पुराना यह मंदिर किसी अज्ञात कारणों के चलते विलुप्त हो गया था। लेकिन बीस वर्ष पहले नदी के तेज बहाव ने, या देवनारायण जी महाराज की कृपा के कारण लोगों को समर्पित हुआ है।

देवनारायण जी महाराज की मूर्ति अलग से कमल के फूल के अंदर निकली। दूसरी तरफ साडू माता की मूर्ति है। जिन्होंने गोद में नारायण जी को ले रखा है। मंदिर के पास में नदी तथा उसके ऊपर पुल का दृश्य सुंदरता में चार चांद लगा रहा है।

अपने विचार।
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निर्मल काया मेहनत की माया,
और जीवन परहितकारी हो।
वो सिद्धि प्राप्त होते है,
चाहे वो नर या नारी हों।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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