घर आए मांगणियार से आज भी मां गुआती है अरणी गीत, दूर ब्याही बेटी का सोच कर भर आती है आंखें

हर स्थान का अपना लोक महत्व होता है और अपने ढंग का लोकसौंदर्य जिसका एक बड़ा हिस्सा होता है लोकगीत। लोक गीत गाने वाले कवि जनकवि कहलाते हैं। वे कैसे किसी को रुला सकते हैं? और कैसे घड़ी भर में रायचंद बना देते कि-“छूटी रे म्हारै छाछराणे रेल रे, मनडे़ रा मेळू रै”।

दप्पू खान कहते हैं कि मैं तो अपनी पत्नी के लिए भी गा लेता हूँ जब वह किसी नोकझोंक में मुझसे परेशान रहती है।

वहीं हिंदी के ख्यात कवि आलोक धन्वा एक कविता में कहते हैं – “दो-चार उबले हुए आलू ने बचाया मेरी आत्मा को”। वैसे ही खेत में तवी निकालते ट्रैक्टर चालकों, सूनी नांण में हाथ में टेप-मोबाइल लिए मरुधर के ग्वालों की आत्मा को बचाया माणिघर, डोरो, अरणी, रायचंद, बरसालो जैसे प्यारे गीतों ने।

उन्हें बचाया धुंधलिया धौरां चलती मोटर गाड़ी ने।

लोकगीतों के समवेत स्वर

लोक को संजोए अभी भी है शेष

अभी भी अकाल से जुझती थलियों में

दीवड़ी में जल लिए नासेटूओं के लिए

प्राण, पाणी,प्याज और बाजरे की

रोटी के ठीक बाद स्थान आता है इनका

अभी भी थिरकते है पांव

दूर सीम से आती रायचंद की आवाज से

अभी भी शेष है बड़े-बुज़ुर्गों की

आंखों में दो बूंद अपनों के लिए,

अभी भी मांगलिक कार्यक्रम में

मांगणियारों का आना माना जाता है शुभ

अभी भी गाए जाते है मधुर गीत

गायी जाती है कोयल विदा होती बेटी के लिए

अभी भी होती है घोळै-,घूमर,

दूर ब्याही बेटी के लिए मां

अब भी गुआती हैं अरणी घर आये मांगणियार से।

बता दें कि अरणी बाड़मेर-जैसलमेर और बीकानेर के कुछ कोनों में गाया जाने वाला गीत है। अरणी मूलत: बाड़मेर की तरफ होने वाला एक झाड़ीनूमा पेड़ है जिसके श्वेत पुष्प बहुत आकर्षक होते हैं।

तभी अरणी के लिए कहा गया – “अरणी आछा फूल /हरियाळी मगरै हुआ”। यह ज्यादा उपयोगी झाड़ नहीं है। बिलौना करने के जिस ‘झेरणा’ को काम में लिया जाता है, वह अरणी से ही बनता है। इसी अरणी की लकड़ी से झोंपड़े की स्तरनूमा बाड़ भी बनाई जाती है जिसे यहाँ ‘त्राटी’ कहा जाता है।

उत्तरप्रगतिशील और आधुनिकता से पहले सबसे बड़ी बात यह आती है कि हमारी ब्याही बेटी का स्वास्थ्य ठीक रहे और उसे किसी भी प्रकार का प्रताड़ित दुख नहीं हो।अमूमन हमारे आसपास ऐसी बहुत घटनायें सुनते हैं जिसमें वह परेशान होकर आखिर में ‘खड्ड’ भरती है। ऐसे में अरणी जैसे भावुक गीतों पर हर एक आंसू आना बहुत स्वाभाविक है।

अरणी को भुंगड़खान जैसिंधर, कुटळ खान देवडा़, सदीक खान किसौला आदि लोगों बहुत सुंदर तरीके से गाया है।

पेश है एक झलक

अरणी रै आछा फूल हरियाली मगरै हुआ

झाटके न्हांखा झूल झेरा तो आये करहलिया

 

भाभाजी उण घर दीजै जिण घर सांढणिया होय

अळघा रा नैडा़ करै, लंबी बिरखड़िया

 

माता मोंजी रै अरणी रै, लागोडा़ आछा फूल

आछियोडा़ फूल ए फूलडा़ रै, ए फूलडा़ रै ए….. म्होंरा राज

 

अरै करिया रै मांजै रै ए तो भाभै, भाभै सा रा

पग पग पाछल फोर डाडाणौ रैयग्यो दूर

जामणकी मांजी धिया बाई री

सिधईयो पीसै भेलो घात

ए मां मांझळ ढळती रात…..

ए म्हांरा राज!

 

अरै! आज मिनां दोरियो छूटे अरै छूटे माँ!

ए माँ भाभेजी आगंणौ, ए आंगणौ! ए म्होंरा राज!

 

ए जाये के’जौ मांजी माता नों

ए…… बांधूजी तेड़वा मनों मेल…..!

माता मांजौ हमें रे डाडाणौ

ओ हुवै रेयग्यौ, रेयग्यौ अळघौ!

हवै दूर, दूर म्होंरा राज!

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