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बाड़मेर

48 टैं’क की पाकिस्तानी रेजिमेंट दौड़ी उल्टे पांव, एक शूरवीर से संत बने हणूत सिंह राठौड़ की कहानी

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राजस्थान, जो मेवाड़ से लेकर मारवाड़ तक और सरहदी इलाकों से लेकर शेखावाटी अंचल तक मरूभूमि का हर जिला अपने आप में एक गौरवशाली इतिहास समेटे हुए हैं। वीर-वीरांगनाओं की धरती पर समय-समय पर ऐसे लोगों ने अपना करिश्मा बिखेरा जिनका नाम आज भी जुबां पर आते ही सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।

राजस्थान के सरहदी इलाके में बाड़मेर जिले से 102 किलोमीटर दूर जसोल जिले से एक ऐसा नाम है जिसका जिक्र आते ही आज भी रोम-रोम जोश से भर जाता है।

जसोल गांव में आप जब भी जाएंगे आपको वहां भारतीय सेना का एक टैं’क रखा हुआ दिखेगा जो एक शख्स की बहादुरी का जीता-जागता सबूत है।

हम बात कर रहे हैं 17 पूना हॉर्स के कमांडिंग ऑफ़िसर हणूत सिंह राठौड़ को उनके साहस और बहादुरी के चलते 1971 की लड़ाई में खुद पाकिस्तान की सेना ने उन्हें ‘फ़क्र-ए-हिन्द’ के खिताब से नवाजा था।

हणूत सिंह का जन्म 6 जुलाई 1933 को हुआ जो 11 अप्रैल 2015 को शहीद हुए। हणूत सिंह राजस्थान के लड़ाकू संत रावल मलिकनाथ जी के वंशज हैं। आइए जानते हैं लेफ्टिनेंट जनरल हणूत सिंह राठौड़ के सफर के बारे में।

48 टैंक की रेजिमेंट पर अकेले पड़ गए भारी

हणूत सिंह पूना हॉर्स रेजिमेंट में थे और 1971 के युद्व में पाकिस्तान की 48 टैं’क की रेजिमेंट भारत की तेजी से बढ़ रही थी। भारत की ओर से पूना हॉर्स रेजिमेंट को हणूतसिंह लीड कर रहे थे। हमला होने पर अपनी जान की चिंता किए बिना हणूत सिंह ने एक—एक कर पाकिस्तान के सभी 48 टैं’क को ध्वस्त कर दिया। पाकिस्तान की सेना उल्टे पांव भाग खड़ी हुई।

​सेना के इतिहास में पहली बार हुआ ऐसा कि…

भारत ने उनकी वीरता पर उन्हें महावीर चक्र देकर उनका सम्मान किया। वहीं उनकी रजिमेंट ने उनके पैतृक गांव जसोल में सेना ने एक टैं’क भिजवाया जो आज भी उनके घर के आगे खड़ा है।

आजीवन रहे कुंवारे, देश के लिए दे दी जिंदगी

हणुत सिंह का कहना था कि एक सैनिक होने के नाते अगर वह शादी कर लेते तो परिवार उनकी देश सेवा के बीच में आ जाता। वह आजीवन अविवाहित रहे। ऐसा कहा जाता है कि उनके ड्यूटी के दौरान सेना में उनसे प्रभावित होकर काफी जवान शादी नहीं करते थे।

एक शूरवीर से संत तक का सफर

हणूत सिंह ने 1991 में अपने रिटायरमेंट के बाद पूर्ण सन्यास की ओर रूख कर लिया। वह आखिरी दिनों में राजपुर स्थित शिवबालयोगी आश्रम में समय बिताते थे।

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