बेंगू का किसान आंदोलन जिसमें किसानों की शहादत ने बेगार प्रथा को खत्म कर दिया

राजस्थानी के विलक्षण कवि रामस्वरूप किसान का एक दोहा है कि “हक द्यौ म्हारौ हाकमां/नीं लेवांला खोस अब ऐसे दोहे यूं ही नहीं लिखे जाते यह प्रतिरोध की मिसाल को जलाने में ईंधन का काम करते हैं। राजस्थान में किसान आंदोलनों की लंबी फेहरिस्त है और इन्हीं किसान आंदोलनों की जमीन में फैला बेंगू किसान आंदोलन महत्पूर्ण है।

बेंगू आंदोलन बिजौलिया किसान आंदोलन का प्रतिफल है, बिजौलिया किसान आंदोलन से प्रोत्साहित होकर ही बेंगू के किसानों ने आंदोलन किया था। आइए जानते हैं क्या रहा इसका इतिहास? किसान आंदोलन का 1921 में भीलवाड़ा में मेनाल के भैरव कुंड के पास से उदय होता है जिसका नेतृत्व राम नारायण चौधरी ने किया।

बेंगू एक रियासत थी और जागीरदारों का अपना एक दबदबा था। वे लोग लाग बाग, किसानों से जुल्म आदि पर विश्वास रखते थे और कोई इतना जुल्म कितने दिन सह सकता है। इसी बात का प्रतिफल होता है कोई आंदोलन। बेंगू किसान आंदोलन में धाकड़ जाति का अहम योगदान रहा।

कैसे आगे बढ़ा आंदोलन

रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में किसानों ने फैसला लिया कि फसल का कूंता नहीं करवाया जाएगा। जागीरदारों को यह बात सहन नहीं हुई और मई 1921 में बेंगू के कर्मचारियों ने चांदखेड़ी जगह पर किसानों से अमानुष व्यवहार किया। अब बात यहीं समाप्त होती है।

साल 1923 में किसानों और ठाकुर के बीच में एक समझौता होता है और इस समझौते में एक आयोग का गठन होता है इसे ट्रेंच आयोग कहा जाता है। ट्रेंच आयोग की नीतियां किसानों के विरोध में थी या कहें कि किसानों के समर्थन में नहीं थी इसलिए किसानों ने उसका विरोध किया।

13 जुलाई 1923 को गोविन्दपुरा नामक गांव में में किसानों का का एक बड़ा सम्मेलन तय हुआ और आयोजित होने पर किसानों पर गोलियां चलाई गई जिसमें रूपाजी धाकड़ और कृपाजी धाकड़ नामक दो किसान शहीद हुए और बेगार प्रथा को समाप्त कर दिया गया। विजयसिंह पथिक अंत में इस आंदोलन के आगीवाण रहे।

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