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भीलवाड़ा

पृथ्वी के गर्भ को चीर कर प्रकट हुई महादेव की मूर्ति जो एक अधर लटकती शीला के ऊपर है विराजमान

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adharshila mahadev mandir bhilwara

स्वास विश्वास जोरा की चीज,
जीवन इन पर टिका हुआ।
जिनको इनका बोध नहीं,
समझो वह मीटा हुआ।

अधर लटकती शीला की आश्चर्यजनक कहानी।
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दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी अचंभित करने वाली कहानी सुना रहा हूं। जिसको सुनकर आप के भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे। टेक्सटाइल नगरी के नाम से मशहूर भीलवाड़ा (Bhilwara) से दस किलोमीटर दूर पुर (Pur) नामक स्थान पर एक ऐसा चमत्कारिक महादेव मंदिर है। जिसकी मूर्ति एक अधर लटकती शीला के ऊपर विराजमान है, तथा पृथ्वी के गर्भ को चीर कर अपने आप प्रकट हुई थी।

यह मंदिर राजा महाराजाओं के समय से ही यहां पर स्थापित किया हुआ है। इस मंदिर की मुख्य विशेषता यह है कि इसकी मूर्ति अधर लटकती शीला के ऊपर स्वयंभू प्रकट हुई थी। इस समय इस मंदिर की पूजा अर्चना महंत शंभू नाथ जी योगी महाराज जी कर रहे हैं।

महंत छोटे शरण शास्त्री जी कहते हैं कि यहां जो भी श्रद्धालु अपनी जैसी भी श्रद्धा लेकर आता है उसकी भोलेनाथ श्रद्धा पूरी करते हैं। यहां पर एक मोर कुंड (Mor Kund) नामक स्थान है। जिसके ऊपर मोर की आकृति छपी हुई है। वह कुंड बारहों महीने पानी से भरा हुआ रहता है। इसी पहाड़ के ऊपर एक गुफा बनी हुई है, जो लगभग 500 फीट लंबी है। उस गुफा के अंदर किसी जमाने में शेर रहा करते थे, जो अपनी दहाड़ से सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते थे।

यह मंदिर नाथ संप्रदाय का है, जहां पर नाथ संप्रदाय के व्यक्ति ही इसकी पूजा अर्चना करते हैं। दीप द्वारा पूछे गए प्रश्न का जवाब देते हुए वहां के महंत कहते हैं कि यह संतों की तपोस्थली है, और उन्हीं के तप के द्वारा यह अधरशिला अधर में लटक रही है। यहां पर किसी जमाने में मुनि नाथ जी महाराज (Muninath Ji Maharaj) रहा करते थे। जिनके तप के कारण इस चट्टान का एक कोना पीछे की साइड का टिका हुआ है, बाकी पूरी चट्टान अधर में लटक रही है।

शिवरात्रि (Shivratri) के दिन यह चट्टान दो अंगुल ऊपर उठ जाती है, तथा धागा लेकर इसको चारों तरफ घुमाने से आपको मालूम पड़ जाएगा कि यह चट्टान अधर में लटक रही है। सावन मास की हरियाली अमावस्या को यहां पर पांच दिन का मेला भरता है। जिसमें लाखों की तादाद में श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है। इस पहाड़ी के बिल्कुल ऊपर चोटी पर आकाशीय भेरुजी महाराज का मंदिर है। जहां पर आपको पैदल ही सावधानी पूर्वक जाना पड़ता है। वहां जाने के लिए कोई साधन नहीं है, और बहुत ही जोखिम भरा है।

मान्यता के अनुसार मोर कुंड में स्नान करने से सभी प्रकार के फोड़े फुंसी दूर हो जाते हैं। मोर कुंड के पास में एक बहुत बड़ा स्थान है। जहां पर सभी लोग अपना दाल बाटी चूरमा तथा अन्य भोजन बनाते हैं और दावत भी करते हैं।

” जय झलको _ जय राजस्थान।”

अपने विचार।
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चमत्कार विश्वास है,
जो करता विश्वास।
शुद्ध आत्मा मनन करो,
पूर्ण होती आस।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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