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राजस्थान

राजस्थान का वह किसान आंदोलन जो लगभग आधी शताब्दी तक चला, कैसे!! पूरी रियासत को झुकना पड़ा

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राजस्थान में जुल्म और अन्याय के खिलाफ कई आंदोलन हुए इनमें किसान आंदोलनो की लंबी फेहरिस्त है। बिजोलिया किसान आंदोलन मुख्य किसान आंदोलनों में से एक है।
बिजोलिया किसान आंदोलन का उद्भव 1897 में मेवाड़ के किसानों द्वारा होता है। दरअसल यह किसान आंदोलन बिजोलिया जागीर से लेकर आसपास के पूरे जागीरदारों के जुल्म के खिलाफ खड़ा हो गया था।नेतृत्व करने वालों में मुख्य रूप से विजय सिंह पथिक का नाम आता है। माणिक्य लाल वर्मा सीताराम दास का नाम भी प्रमुख है।

रामस्वरूप किसान की एक दोहा मुझे याद आ रहा है जिसे यहाँ जोड़ना ठीक होगा-“हक द्यौ म्हारौ हाकमां/नीं लेवांला खोस”।और यह हक यदि अगला नहीं देगा तो छीनने की नौबत भी आ सकती।किसानों की मांगों को लेकर हमेशा से नौबतें आती रहीं।चाहे आज की सरकार हो चाहे राजे रजवाड़े। किसान आंदोलन की कुछ महत्वपूर्ण मांगे इस भाँति थी कि वे लागबाग नहीं देना चाहते थे और यह लगभग एक प्रकार का नहीं 84 प्रकार का था।इसके अलावा लाटा कूंता कर, चवरी कर जो किसान की बेटी की शादी पर पर लिया जाता है, आदि कर थोपे गये थे।

बिजोलिया आंदोलन सर्वाधिक समय तक चलने वाला आंदोलन था।लगभग आधी शताब्दी तक चलने वाला।इस आंदोलन में कई महिला नेत्रियों ने अपना योगदान दिया जिसमें नारायणी देवी देवी का नाम प्रमुख है।इस आंदोलन को बड़े पर्दे पर लाने के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी आदि लोगों ने पत्रों में इस आंदोलन को प्रकाशित किया। जानकारी के मुताबिक जानकी देवी का भी संवाद बिजोलिया किसान आंदोलन से रहा था।

आंदोलन तीन चरणों में हुआ था प्रथम चरण 1897 से 1917के बीच, द्वितीय चरण 1916 से 1927 के बीच, तीसरा चरण आंदोलन 1927 से 1941 के बीच। हर चरण में नेतृत्वकर्ता बदले और लेकिन आंदोलन का मोटो एक ही रहा। आंदोलन की शुरुआत होती है एक कर लगाने से।दरअसल राव कृष्ण सिंह ने पांच ₹5 की दर से चंवरी कर लगाया था इसका मतलब था कि किसानों को बेटी के शादी के बाद जो चंवरी फिरना होता है, उस समय लाग देना पड़ता था।किसानों को यह बात अच्छी नहीं लगी।

किसान किसान होते हैं मुफलिसी उनके यहां घर करके होती है।उन्होंने फैसला लिया कि कैसे करके हमें यह बात रामकृष्ण सिंह के सामने रखनी है ताकि हमें इसके लिए थोडी रियायत दी जाए। लगभग किसान धाकड़ जाति के थे।एक गांव में एक मृत्युभोज था और वहां पर सभी किसान इकट्ठा हुए और एक सभा हुई जिसमें महाराणा के सामने इस संबंध को लेकर एक प्रस्ताव रखा गया।और इस संबंध में कुछ लोगों को भेजा गया महाराणा के पास लेकिन यह प्रस्ताव सफल नहीं हो सका और न ही उनकी मुलाकात।

इसी दरमियान कृष्ण सिंह की मृत्यु हो जाती है और नया राव आता है उनका नाम होता है पृथ्वी सिंह। वे रामकृष्ण सिंह से भी क्रूर होते हैं और एक अतिरिक्त शुल्क और लगा देते हैं।उस शुल्क का नाम होता है तलवार बंधाई, आंदोलन धीरे-धीरे उग्र रूप लेता जा रहा है और साधु संत सीताराम और अन्य कुछ साथियों को बिजोलिया से निकाल दिया जाता है।

1916 में द्वितीय चरण में विजय सिंह पथिक इस आंदोलन में जुड़ते हैं।1917 में उपर माल बोर्ड पंचायत का गठन किया जाता है।और इसके प्रथम अध्यक्ष बनाए जाते हैं मुन्ना लाल पटेल। इसी का परिणाम रहा कि एजीजी हॉलेंड के प्रयासों से किसानों और रियासत के बीच में एक समझौता हुआ।यहां से विजय सिंह पथिक ने इस मुद्दे को कांग्रेस के अधिवेशन में उठाया।तीसरे चरण में गांधी जी पुत्र की संज्ञा से नवाजे जाने वाले जमना लाल बजाज की ने नेतृत्व संभाला और यहां एक नया कैरेक्टर आता है जिसका नाम होता है हरिभाऊ, उन्हें उपाध्याय नियुक्त कर दिया। माणिक्यलाल वर्मा ने अपने ‘पंछीड़ा’ गीत से किसानों में जोश भर दिया।1941 में रियासत व किसानों के बीच समझौता हो गया एवं आंदोलन का अंत हो गया।

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