दोनों हाथ थे मुड़े हुए पर अब्दुल ने उठाई परिवार की जिम्मेदारी और कर दिखाया नामुमकिन को मुमकिन!

बीकानेर- परिस्थितियां नहीं, हालात नहीं और न कमजोरियां- इंसान को अगर कमजोर करती है तो उसके असफल होने का भय और आत्मविश्वास की कमी। अगर खुद पर विश्वास कर पूरी दृढ़ता के साथ आगे बढ़ा जाए तब आप हर चुनौती पर विजय प्राप्त कर सकते हैं और इसी की साक्षात नजीर पेश की है अब्दुल रशीद ने। अब्दुल दोनों हाथों से जन्म से दिव्यांग हैं, उनके दोनों हाथ दुर्भाग्यवश मुड़े हुए हैं। लेकिन बावजूद इसके उन्होंने इस शारीरिक कमी को कमी नहीं माना, बल्कि खुद पर भरोसा कर इन (Bikaner Abdul Rashid) हालात से लड़े और इन्हीं परिस्थितियों में उन्होंने कलम पकड़ना सीखा, पढ़ाई की, हालांकि पढ़ाई वह ठीक ढंग से पूरी नहीं कर पाएं। लेकिन उन्होंने अपने इन्हीं हालात में खुद पर विश्वास रखकर बाइक चलाना सीखा और मेडिकल स्टोर पर सप्लायर की जॉब करना शुरू कर दी।

मौजूदा वक्त में अब्दुल घर के 5 सदस्यों का लालन-पालन कर रहे हैं। महज 23 साल के अब्दुल रशीद (Bikaner Abdul Rashid) आज लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। यही कारण है कि लोग उनकी हिम्मत और हौसले को सलाम किए बगैर नहीं रह पाते। अब्दुल जब पैदा हुए तो उनके दोनों हाथ मुड़े हुए थे। क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, इसलिए वह उनका इलाज भी नहीं करा पाएं। इस समस्या के चलते उन्हें बहुत परेशान रहना पड़ता। वह बच्चों के साथ खेल सके और पूरा बचपन इसी तरह गुजरा। लेकिन उन्होंने इसे अपनी प्रगति में रोड़ा मानने की बजाय तथा भाग्य को कोसने की बजाय इन हालात से जीतना ठाना, और डटकर इनसे मुकाबला किया।

अब्दुल ने जब 11वीं कक्षा पूरी की तो उनके पिता की मृत्य हो गई, जिसके बाद जिम्मेदारी आ जाने से उनकी पढ़ाई छूट गई। अब्दुल बेहद बेबस थे, क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं था, यही कारण रहा कि उन्होंने मजदूरी का रास्ता चुना। लेकिन शारीरिक निशक्तता के कारण उन्हें कोई मजदूरी भी नहीं दिया करता था। लेकिन जब उन्होंने कम पैसों में काम करने की बात कही तो उन्हें मजदूरी मिलने लगी और मजदूरी कर उन्होंने अपने परिवार का पालन-पोषण किया।

अब्दुल जानते थे कि मजदूरी कर घर का खर्च नहीं चल सकता था। इस बीच उन्होंने हिम्मत कर बाइक चलाना शुरू किया। हालांकि, उन्हें शुरू में परेशानी तो हुई लेकिन प्रैक्टिस ने उन्हें परफेक्ट बना दिया, और आज अब्दुल फर्रातेदार बाइक चलाते हैं। जिसके बाद उन्होंने होम्योपैथिक दवाइयों की दुकान में बाइक पर दवाइयों की सप्लाई शुरू की। यही नहीं अब्दुल होम्योपैथिक दवाइयों को छोटी-छोटी शीशीयों में इस प्रकार भरते हैं कि कोई सामान्य व्यक्ति भी न भर पाए। अब्दुल की यही हिम्मत, आत्मविश्वास और खुद्दारी आज हजारों लोगों की प्रेरणा बनी हुई है।

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