एक ऐसी जगह जहां पाकिस्तान के मुल्तान की मिट्टी से बने मुखौटे पहन कर होती है नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीला

Bikaner: ऐसे बहुत से स्थान हैं जहां कई अलग-अलग प्रकार की रस्में और परम्पराएं निभाई जाती हैं। लेकिन ऐसी कई परम्पराएं हैं जिसके बारे में लोग आज भी नहीं जानते! जी हां, ऐसी ही एक परम्परा है बीकानेर शहर में जहां नृसिंह चतुर्दशी के दिन भगवान नृसिंह और हिरण्यकश्यप की लीला के मंचन की दशकों पुरानी परम्परा है। नृसिंह जयंती के दिन मंदिरों में भगवान नृसिंह के अभिषेक, पूजन, श्रृंगार और आरती के साथ शाम को मंदिरों के आगे नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीलाओं के मंचन होते हैं। जिसे देखने के लिए दूर – दूर से लोग बड़ी संख्या में आते हैं। यह लीला काफी समय से चली आ रही है। लेकिन क्या आपको पता है इस लीला में लीला मंचन के दौरान भगवान नृसिंह और हिरण्यकश्यप स्वरूप की ओर से जो मुखौटे पहने जाते हैं, वे मुल्तान की मिट्टी से बने हैं? जी हां, दशकों से कलाकार इन्ही मुखौटों को पहनकर लीला का मंचन करते हैं।

इन स्थानों पर होता है लीलाओं का मंचन

नृसिंह चतुर्दशी के दिन शहर में डागा चौक, लखोटिया चौक, नत्थूसर गेट, लालाणी व्यास चौक, दुजारियों की गली में स्थित नृङ्क्षसह मंदिरों के आगे नृसिंह-हिरण्यकश्यप लीलाओं के मंचन होते हैं। इस दिन मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन करते हैं। शाम को मंदिरों के आगे लीलाएं होती हैं। भगवान नृसिंह, भक्त प्रहलाद की पुकार सुनकर थंब से प्रकट होते हैं और हिरण्यकश्यप का प्रतीकात्मक वध करते हैं।

किससे बनाए जाते हैं मुखौटे

बताया जाता है कि इस लीला में पहने जाने वाले मुखौटे मुल्तान में बने हुए हैं। बता दें कि मुल्तान अब पाकिस्तान में है। इन मुखौटों को मिट्टी, कागज की लुगदी से तैयार किया जाता है। मुखौटों पर सुनहरे रंग से चित्रकारी होती है। इन पर सोने की कलम का काम किया जाता है। भगवान नृसिंह और हिरण्यकश्यप का स्वरूप धारण करने वाले कलाकार इन्हीं मुखौटों को पहनकर लीला का मंचन करते हैं।

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