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बीकानेर

दीपक को नेशनल टीचर्स अवार्ड, कोरोनाकाल में 800 रूपए का प्रोजेक्टर बना ऑनलाइन शिक्षा को दी नई धार

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केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने हाल में नेशनल टीचर्स अवार्ड के लिए नामों की घोषणा की जिसमें देशभर से 44 टीचर्स को चयनित किया गया है। इनमें राजस्थान के दो टीचर बीकानेर के दीपक जोशी और झुंझुनूं के जय सिंह भी शामिल हैं जिन्हें 5 सितम्बर को नई दिल्ली में राष्ट्रपति सम्मानित करेंगे।

कोरोना काल में प्रदेशभर में ऑनलाइन एज्यूकेशन को धार देने के लिए दीपक जोशी को सरकार सम्मानित कर रही है। दीपक ने पढ़ाई में नवाचार करते हुए, ऑनलाइन शिक्षा को चारों तरफ फैलाकर सरकारी स्कूलों का मान बढ़ाया।

जोशी ने डांडूसर में अपने स्कूल के साथ वहां की 9 सरकारी स्कूलों में ऑनलाइन टीचिंग स्टूडियो तैयार किए जिनकी लागत बहुत कम आई। कोरोना काल में बच्चों को स्मार्ट क्लास व प्रोजेक्टर के माध्यम से पढ़ाई करवाई।

कभी भी साधारण नहीं होता है एक शिक्षक

दीपक कहते हैं कि कोई भी शिक्षक कभी सामान्य नहीं होता है। सबसे पहले मैंने ऑनलाइन पढ़ाई,  राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय डालूसर से शुरू की जिसके बाद यह सिलसिला बढ़ता चला गया। बता दें कि दीपक आज भामाशाहों  के सहयोग से 9 राजकीय विद्यालयो में ऑनलाइन पढ़ाई शुरू करवा चुके हैं।

वहीं बच्चों के साथ मिलकर दीपक ने 800 रूपए की लागत से घर में ही एक मिनी प्रोजेक्टर भी तैयार किया है जिसको देखकर कई शिक्षकों ने उनकी तारीफ की।  उन्होंने बताया कि मैं विद्यार्थियों के सहयोग के बिना कुछ भी नहीं कर सकता था, मैंने 32 कम्युनिटी बेस्ड प्रोजेक्टर  तैयार किए हैं जो समाज के विभिन्न वर्गों में बहुत उपयोगी साबित होंगे।

शिक्षा प्रणाली बननी चाहिए रोजगार परक

दीपक आगे कहते हैं कि शिक्षा डिग्री की मोहताज नहीं है, इसको रोजगार परक होना चाहिए। एक छात्र 80 फीसदी अंक हासिल कर एसटीसी, बीएससी, एमएससी आदि कर रहा है, जबकि एक रोजगार परक हायर सैकेंड्री कम नंबरों वाले स्टूडेंट्स आईटीआई करके 15 हजार तक की कमाई कर लेता है।

बच्चों की रुचि का रखें पूरा ख्याल

वह कहते हैं कि बच्चा बिल्कुल स्वतंत्र होना चाहिए, उसकी रूचि किस चीज में है इसका पूरा ख्याल माता-पिता और गुरुजनों को रखना होगा। एक खेल में रुचि रखने वाले छात्र को यदि आप डॉक्टर बनाना चाहते हैं, तो वह कुछ भी नहीं बन सकेगा। और जिसकी रुचि डॉक्टर बनने में है, वह कभी खेल में सफल नहीं होगा।

बच्चों में किताबी ज्ञान और व्यवहारिक ज्ञान दोनों होने जरूरी है। जोशी कहते हैं कि सबसे पहले बच्चों को स्कूल से जोड़ना पड़ेगा। बच्चों से शिक्षक की पहचान है और शिक्षक की बच्चों से है। दोनों एक दूसरे के पूरक है।

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