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बीकानेर

उस्ता कला जिसमें ऊंट की खाल पर बनाते हैं मनमोहक कारीगरी, बीकानेर में है सांस्कृतिक विरासत

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राजस्थान का बीकानेर जिला खाने पीने के व्यंजनों के अलावा और भी कई मायनों में एक अलग छाप छोड़ता है। बीकानेर हमेशा से ही सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रहा है और ऐसी कई कलाओं का बीकानेर संरक्षक भी रहा, उन्हीं में से एक कारीगरी है उस्ता कला जिसमें ऊंट की खाल पर की जाने वाली मीनाकारी मय कारीगरी हर किसी को लुभाती है।

उस्ता कला का विकास करने वाले मानुष का नाम हिसामुद्दीन उस्ता था। उस्ता साहब को 1986 में पदम श्री से सम्मानित किया गया। ऐतिहासिक जानकारी यह है कि बीकानेर के महाराजा करण सिंह व रायसिंह कुछ उस्ता कलाकारों को मुगल दरबार से बीकानेर लेकर आए थे।

उस्ता कला में ऊंट की खाल से बनी कुप्पियों पर कलात्मक और आकर्षक काम किया जाता है। इन कृतियों पर सराहनीय कार्य किया जाता है और उन्हें आकर्षक बनाया जाता है। बीकानेर के अंदर उस्ता मोहल्ले में आज भी उस्ता कला के कई कलाकार रहते हैं। वे उस्ता कला को आज भी जीवंत बनाए रखे हुए हैं।

ऊंट की खाल पर स्वर्ण नक़्क़ाशी वाली उस्ता कला में पहली बार भारतीय एकता का चित्रण किया गया है। इस कलाकृति के माध्यम से यह संदेश दिया है कि दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है जो दुनिया का हृदय है।

यहां की एकता और अखंडता की मिसाल दुनिया में और कहीं नजर नहीं आएगी। उस्ता कला कई कृतिय़ों में दुनिया का हृदय भारत को बताया गया है। इन कृतियों को ‘भारत के हृदय’ नाम दिया गया है। इसके कृतिकार अयूब अली उस्ता ने बताया कि इसमें हिन्दू-मुस्लिम-सिख और ईसाई चारों धर्मों के प्रतीकों को उनके रंगों से हिसाब से बताया गया है।

फिलहाल उस्ता कला के मुख्य प्रर्वतक हिसामुद्दीन के पौत्र मोहम्मद जमील उस्ता दादा की इस ख़ूबसूरत कला को आगे बढ़ा रहे हैं।जमील उस्ता दो बार ‘राजस्थान ललित कला अकादमी जयपुर’  के सदस्य भी रह चुके हैं। बीकानेर का “केमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर” उस्ता कला का प्रशिक्षण संस्थान है। बीकानेर की उस्ता कला ने राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम कमाया।

मेलों, प्रदर्शनियों आदि में इस कला से सज्जित ऊंट की खाल की सुराहिया, कुप्पियां, टेबल लैंप, आभूषणों पर खूब अच्छे से कारीगरी की गई है। बीकानेर में बनी उस्ता कला की कृतियां चाव से पंसद की जाती है।

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