इतिहास के 3 बड़े जौ’हर का साक्षी रहा दुर्ग शिरोमणि चित्तौड़गढ़ दुर्ग की कहानी अद्भुत र’हस्य

राज्य का सबसे प्राचीन दुर्ग और राजस्थान का दक्षिण पूर्वी द्वार कहलाया जाने वाला यह किला चित्तौड़गढ में गंभीरी और बेड़च नदी के संगम पर स्थित है। यह किला राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 76 और 79 के चौराहे पर स्थित है। चित्तौड़गढ के किले को प्राचीन किलों का सिरमौर कहा गया है। अपनी प्राचीनता के कारण इस किले की उत्पत्ति के संबंध में स्पष्ट प्रमाण और साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। लेकिन लोककथाओं के अनुसार माना जाता है कि 7 वीं शताब्दी में मौर्य वंश के शासक चित्रांगदा मौर्य द्वारा चित्रकूट पहाड़ी पर इस किले का निर्माण करवाया गया था। इसी आधार पर इसका नाम चित्तौड़गढ पड़ा है।

कुछ प्रचलित कथाओं के अनुसार यह भी कहा जाता है कि गुहिल राजवंश के बप्पा रावल द्वारा 724 ईस्वी में इस किले की स्थापना की गई और लगभग 834 वर्षों तक मेवाड़ द्वारा शासन किया गया। यह भव्य किला भारत और एशिया का सबसे विशालतम दुर्ग है। ऊपर से देखने पर इसकी आकृति मछली जैसी दिखाई देती है। यह किला लगभग 180 मीटर की ऊँचाई और 3 किलोमीटर लम्बाई पर बना हुआ है, इसकी परिधि 13 किलोमीटर लम्बी है और यह किला लगभग 700 एकड़ की जमीन पर फैला हुआ है। किले में 7 प्रवेश द्वार, 1 मुख्य द्वार, 2 मीनार और लगभग 65 ऐतिहासिक संरचनाएँ बनी हुई है जिनमें – 4 महल परिसर, 11 मुख्य मंदिर, 22 जल निकाय इत्यादि सम्मिलित है।

7 प्रवेश द्वार जिनके नाम इस प्रकार है – राम पोल , लक्ष्मण पोल, पादन पोल, गणेश पोल, जोरला पोल, भैरों पोल और हनुमान पोल।इन 7 द्वारों को पार करने के बाद मुख्य द्वार आता है जिसे सूर्य पोल कहा जाता है। इस दुर्ग को ‘पानी का किला’ भी कहा जाता है। कहा जाता है कि किले परिसर में कुल 84 जल निकाय थे जिनकी संख्या वर्तमान समय में घटकर 22 रह गयी है जिनमें तालाब, कुएं, बावड़ी आदि शामिल हैं। इस दुर्ग में कृषि भी की जाती है और ऐसा भी कहा जाता है कि यदि इस किले में वर्षभर पर्याप्त मात्रा में जल का संग्रह किया जाए तो वह जल लगभग 50,000 सैनिकों द्वारा 4 वर्षों तक उपयोग में लिया जा सकता था।

चित्तौड़गढ का यह दुर्ग इतिहास की सबसे खू’नी ल’डा़ई का गवाह रह चुका है। इस दुर्ग ने 3 बडे़ मुस्लिम आक्र’मण अपने ऊपर झेले है और इन्ही आक्र’मणों के दौरान रानियों द्वारा अपनी मान बचाने के लिए किये गये इतिहास के 3 बड़े जौ’हर भी हुए।

पहला आक्र’मण 1303 में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा किया गया। इस आक्र’मण में इतिहास का सबसे पहला और चर्चित जौ’हर रानी पद्मिनी द्वारा 16,000 रानियों, दासियों और बच्चों के साथ किया गया था। इस यु’द्ध में गोरा और बादल ने भी अपना पराक्रम दिखाया था।

दूसरा आक्र’मण 1535 में बहादुर शाह द्वारा किया गया। इस यु’द्ध में रानी कर्णावती ने 13,000 रानियों के साथ मिलकर जौ’हर किया था।

तीसरा आक्र’मण 1567 में अकबर द्वारा राणा उदयसिंह पर विजय पाने के लिए किया गया था। इस यु’द्ध में रानी फूलकँवर ने अनेकों दासियों के साथ मिलकर जौ’हर किया था। इस यु’द्ध में जयमल और पत्ता भी श’हीद हुए।

इस दुर्ग के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में – विजय स्तम्भ, कीर्ति स्तम्भ, राणा कुम्भा पैलेस, पद्मिनी पैलेस, मीरा मन्दिर, कालिका माता मन्दिर, फतेह प्रकाश पैलेस, जैन मन्दिर इत्यादि है।

विजय स्तम्भ – (जिसका अर्थ है ‘विजय का मीनार’)इस मीनार को राणा कुम्भा ने मालवा के सुलतान महमूद खिलजी पर विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था। यह 9 मंजिला स्तम्भ 12 फीट ऊँचा है और इसमें 157 सीढिया बनी हुई है। इसको हिन्दू देवी देवताओं का अजायबघर भी कहा जाता है।

कीर्ति स्तम्भ – (टाॅवर ऑफ फेम)यह स्तम्भ पहले जैन तीर्थकर आदिनाथ जी को समर्पित है। इसका निर्माण एक जैन व्यापारी जीजा भार्गव द्वारा करवाया गया। यह 7 मंजिला मीनार 22 मीटर ऊँचा और 30 फीट चौडा है।

जौहर कुण्ड – विजय स्तम्भ के समीप स्थित इसी कुण्ड में राजपूत रानियों द्वारा जौ’हर किया गया था।

समिधेश्वर मन्दिर – यह मंदिर 3 सिर वाले शिव की मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है।गौमुख जलाशय – पठार के चट्टान के अंत में बना यह एक पूर्ण प्राकृतिक सौन्दर्य स्थल है।

राणा कुम्भा पैलेस – यह राणा कुम्भा का मुख्य निवास स्थान था जो अब खंडहर बन चुका है। यह स्थान कभी प्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीरा बाई का घर था।

पद्मिनी पैलेस – यह राजा रावल रतन सिंह की पत्नी रानी पद्मिनी का महल है।

मीरा मन्दिर – इसका निर्माण राणा कुम्भा द्वारा 1449 में करवाया गया। यह मन्दिर मीरा बाई को समर्पित है।

कुंभ श्याम मन्दिर – यह मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मंदिर 15 वीं शताब्दी के चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।

कालिका माता मन्दिर – यह 14 वीं शताब्दी का बना हुआ मंदिर है। देवी काली को समर्पित इस मन्दिर को अलाउद्दीन खिलजी के हमले के बाद नष्ट कर दिया गया था। राजस्थान के इतिहास में गौरव का प्रतीक यह विशालकाय दुर्ग को जून 2013 में यूनेस्को की विश्व विरासत स्थल की सूची में सम्मिलित किया गया है। राजपूताना विरासत के महत्वपूर्ण एवं प्राचीन धरोहरों में से एक इस किले के बारे में यह कहावत प्रचलित है कि – “गढ़ तो चित्तौड़गढ बाकी सब गढै़या” ।

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