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चूरू

आचार्य महाप्रज्ञ जो है आधुनिक विवेकानंद जिनकी चोट ने खोली तीसरी आँख

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आठ वर्षीय बालक नत्थू की दीवार से टकराने की वजह से तृतीय नेत्र या ज्ञान चक्षु खुल गया था। वही नत्थू आगे चलकर आचार्य महाप्रज्ञ कहलाए। टमकोर नामक स्थान उनकी जन्मस्थली है। उनका जन्म 14 जून 1920 को हुआ था। उनके पिता का नाम तोलाराम व उनकी माता श्री का नाम बालू जी था। जब नथमल ढाई महीने के थे तब ही उनके पिता तोलाराम का देहावसान हो गया था। उनकी उम्र उस वक्त ढाई माह होने के बावजूद भी उन्हें सब याद था।यह उनकी विशिष्ट स्मृति का विरल उदाहरण है।आठ वर्ष की उम्र में ही वे अपना पारिवारिक व्यवसाय संभालने की खातिर कलकत्ता चले गए थे।

उन्होंने ग्यारह वर्ष की उम्र में तेरापंथ के आचार्य कालुगुणी से दीक्षा प्राप्त की।आचार्य कालूगणी के कहने पर मुनि तुलसी जो आगे चल कर तेरापंथ के नौवें आचार्य बने, के मार्गदर्शन में दर्शन, न्याय, व्याकरण, मनोविज्ञान, ज्योतिष, आयुर्वेद आदि का तथा जैन आगम, बौद्ध ग्रंथों, वैदिक ग्रंथों तथा प्राचीन शास्त्रों का गहन अध्ययन किया था। वे संस्कृत भाषा के आशु कवि थे। वे हिंदी, संस्कृत प्राकृत मारवाड़ी सहित अनेक भाषाओं के ज्ञान में निपुण थे। राष्ट्रकवि दिनकर ने उनकी तुलना स्वामी विवेकानंद से करते हुए कहा कि

“महाप्रज्ञ आधुनिक विवेकानंद हैं. हमने विवेकानंद को नहीं देखा है, उनके बारे में सिर्फ पढ़ा और सुना है. लेकिन अब हम विवेकानंद को उनके विजन के जरिए देख सकते हैं”

उनके बच्चपन की बात है। एक महात्मा ने उनको लेकर भविष्यवाणी कर दी कि यह बच्चा बड़ा होकर महात्मा बनेगा। वही भविष्यवाणी आगे चलकर सच्च हुई। जब वे किशोरावस्था में थे।तब उन्हें दीक्षा के लिए गुरु तुलसी के पास भेज दिया गया। जहां उन्हें संस्कृति एवम् साहित्य की शिक्षा दी जाने लगी। छोटी उम्र में ही उनकी अध्य्यन व ग्रहण क्षमता अद्भुत थी। उस वक्त उनकी मां एवम् बहन ने वैराग्य ओढ़ लिया था व दीक्षा को प्राप्त किया। कहते है कि जिस जिस पर आचार्य महाप्रज्ञ की कृपा हो जाती है उनके जीवन में यश धन और खुशी की कोई कमी नहीं रहती। टमकोर में आज उनकी हवेली व संग्रहालय भी बना हुआ है। जहां श्रद्धालु तो आते ही है साथ में उच्च पदाधिकारी भी आस्था रखते है। वहां का पानी पीने के लिए पूरे भारत से लोग आते हैं। कहते है कि उस पानी को पीने से कैंसर रोगियों को राहत मिलती है। संग्रहालय में उनके जीवन के अलग अलग पड़ावों की प्रदर्शनी भी लगाई गई है।

हजारों सालों भारत की इस धरा ने हजारों आध्यात्मिक संत दिए जिन्होंने जीवन पर्यन्त समाज के हित में कार्य किया। भारत के किसी कोने में बुद्ध तो कहीं महावीर कहीं नानक हुए। यह वह देश है, जहां वेद का आदिघोष हुआ, युद्ध के मैदान में भी गीता गाई गयी, वहीं कपिल, कणाद, गौतम आदि ऋषि-मुनियों ने अवतरित होकर मानव जाति को अंधकार से प्रकाश पथ पर अग्रसर किया। आचार्य महाप्रज्ञ अध्यात्म पर बल देते थे। अहिंसा की बात करते थे।जिस पथ पर बुद्ध गांधी चले उसी दिशा में आचार्य महाप्रज्ञ चले। आचार्य सांप्रदायिक द्वेष लोगों के कष्टों को लेकर चिंतित थे। अपना जीवन इन्हीं समस्याओं को हल करने में साधा।

आचार्य महाप्रज्ञ कहते है कि जब हम आंनद को भौगोलिक स्तर पर खोज लेते है तो मंत्रणा बंद हो जाती है। आचार्य ने अपने जीवन में तीन सौ से अधिक किताबें लिखी। आचार्य होने के साथ वे बड़े दार्शनिक थे। उन्होंने भारतीय दर्शन के साथ साथ पाश्चात्य दर्शन का भी अध्ययन किया। आगे चलकर वे भी तेरापंथ के दसवें आचार्य बने।
9 मई 2010 को इस महान आत्मा का देवलोक गमन हो गया।

   
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