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चूरू

चूरू के ददरेवा में सांपों के देवता हैं गोगाजी, मंदिर में भक्त खाते हैं 21 किलो की सांकल

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पाबू, हड़बू, रामदे, मांगळिया मेहा

पांचू पीर पधारजौ गोगाजी जेहा

राजस्थान के चूरू जिले के सादुलपुर उपखण्ड के गांव ददरेवा में भाद्रपद की नवमी को छटा निराली होती है और ऊपर लिखे दोहे से वातावरण गुंजायमान हो जाता है क्योंकि इस दिन सामाजिक समरसता के प्रतीक लोकदेवता गोगाजी महाराज की जन्मस्थली पर श्रद्धा का सैलाब उमड़ता है।

गोगाजी धाम पर राजस्थान, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के कई इलाकों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं। चलिए आज जानते हैं क्या है लोकदेवता गोगाजी का इतिहास।

सांपों के देवता हैं गोगाजी

गोगाजी का जन्म चूरू के ददरेवा में चौहान वंश के शासक जब्बर सिंह के घर हुआ।  गोगाजी अपने समय में राजा भी रहे और जिनका क्षेत्राधिकार सतलुज से हरियाणा की हांसी नदी तक था।

वहीं ददरेवा में गोगाजी की जन्मस्थली पर एक जाल का वृक्ष है जिस पर पीलू नामक फल लगता है। माना जाता है कि इस जाल के पेड़ पर धागा बांधने से हर मन्नत पूरी होती है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यह जाल गोगाजी के समय की है।

गोरखटीला में है गोगाजी के गुरू का स्थान

गोगाजी गोरखनाथ के शिष्य माने जाते हैं जिनकी आराधना में उनका पूरा समय गुजरा। ददरेवा में गोगाजी की जन्मस्थली से थोड़ी दूरी पर एक टीले पर गोरखनाथ जी की पूजा होती है जिसे गोलखटीला कहा जाता है। वहां बने धूणे पर भी श्रद्धालु शीश झुकाते हैं।

गोरखनाथ जी के साथ यहां पर गोगाजी की भी पूजा होती है। बता दें कि चूरू जिले के सादुलपुर इलाके में स्थित ददरेवा धाम देश का ऐसा अनूठा मंदिर है जहां गोगाजी और गुरु गोरखनाथ मंदिर में प्रसाद के रूप में प्याज चढ़ाया जाता है। प्याज चढ़ाने की ये परंपरा सालों पुरानी है।

गुरू गोरखनाथ के वरदान से हुआ गोगाजी का जन्म

वि.स. 1330 में जन्में गोगाजी 1352 में गद्दी पर बैठे और 1392 में हनुमानगढ़ जिले के गोगामेडी़ में समाधि ली। माना जाता है कि ददरेवा मंदिर के गर्भगृह में रखी मूर्ति स्वत: भूमि से निकली।

वहीं मंदिर परिसर में ही एक शिवलिंग भी स्वत: निकला हुआ है. मंदिर के पुजारी का कहना है कि सांप खाए हुए आदमी के काटे हुए स्थान पर मंदिर में रखी मटकी की मिट्टी लगाते हैं जिससे वह सही हो जाता है। इसके अलावा मंदिर में सांप को चाहे कोई भी पकड़ ले वह खाता नहीं है।

इसके अलावा मंदिर में करीब 21 किलो की सांकल भी रखी है जिन्हें गोगाजी की छड़ी कहा जाता है, सांप खाए व्यक्ति गोगाजी का नाम लेकर यह सांकल खाते हैं जिनसे उन्हें सर्प दंश से मुक्ति मिलती है।

मान्यता है कि गोगाजी का जन्म गुरू गोरखनाथ के वरदान से हुआ था। गोगाजी की मां बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के लिए तमाम कोशिश करने के बाद भी उन्हें संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ ‘गोगामेड़ी’ के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गई तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा।

वहीं गोगाजी की मान्यता हर गांव में होने के कारण लोक में एक कहावत प्रचलित है कि “गांव-गांव में खेजड़ी और गांव– गांव में गोगा”। ददरेवा में आने वाले श्रद्धालुओं को यहां की लोकभासा में ‘जातरू’ कहा जाता है। यह जातरू गुरु गोरखनाथ और जाहर वीर नाम से गोगाजी के भजन करते हैं जिनके हाथ में डैंरू व कांसी का कचौला विशेष रूप से सज्जित होता है।

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