चूरू के दिव्यांग संतोष कुमार ने रीट एग्जाम में मारी बाजी, आरक्षण का नहीं लिया सहारा!

Churu handicap Santosh Kumar Creacks REET: संतोष कुमार, कोहिना, तारानगर, चूरू।
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जिस का जज्बा ऊंचा हो,
उसके लिए मंजिल दूर नहीं।
आरक्षण तो एक सहारा है,
उसको सहारे की फुर्सत नहीं।

एक दिव्यांग का हौसला, हिम्मत और फिर हासिल  सफलता।
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दोस्तों नमस्कार!
दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसे दिव्यांगजन से रूबरू करवा रहा हूं, जिसने अपनी मंजिल को अपने जज्बे और हौसले से प्राप्त किया है। उसको किसी आरक्षण की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।

परिवार और परिचय।
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चूरू (Churu) जिले के तारानगर (Taranaar) तहसील के कोहीना गांव (Kohina Village) के एक दिव्यांग, जज्बा धारी, युवक संतोष कुमार (Santosh Kumar) ने हमारे संवाददाता मनोज से बात करते हुए अपने बारे में विस्तृत बातें साझा की। पेश हैं इंटरव्यू के कुछ विशेष अंश…

प्नश्न: आपकी शिक्षा के बारे में बताएं?

उत्तर:  मेरी बारहवीं तक की शिक्षा गांव के ही सरकारी स्कूल में हुई। मेरे दसवीं में बहुत अच्छे नंबर थे, लेकिन बाहर नहीं जा सकने की वजह से मैंने आर्ट्स सब्जेक्ट लिया और गांव में ही पढ़ाई की। बाहर जाकर पढ़ाई करने में और वहां रहने में मुझे बहुत परेशानी होती है। तब मैंने पढ़ाई में होशियार होते हुए भी गांव की ही सरकारी स्कूल में 12वीं तक शिक्षा ग्रहण की।उसके बाद में मैंने बीएसटीसी (BSTC) का फॉर्म भरा और मुझे डाइट (DIET) कॉलेज चूरू मिली। बीएसटीसी (BSTC) करते ही रीट (REET) की वैकेंसी निकली व मैंने तैयारी शुरू कर दी।

प्रश्न: आपकी प्रतियोगिता परीक्षा के सफर के बारे में कुछ बताएं तथा आप इस बीच आप कितने घंटे पढ़ाई किया करते थे?

उत्तर: मेरा यह फर्स्ट कंपटीशन एग्जाम था, जिसकी मैंने जमकर तैयारी की तथा 150 में से मुझे 139 नंबर प्राप्त हुए।  लोग मुझे हीन भावना से देखते थे, और कहते थे, कि तुम्हारा तो दिव्यांग कोटे से सिलेक्शन हो जाएगा। लेकिन मैंने ऐसी तैयारी की कि मुझे दिव्यांग कोटे की आवश्यकता ही नहीं पड़ी।  पढ़ाई में घंटे नहीं गिने जाते हैं, वैसे लगभग मैं प्रतिदिन सात से आठ घंटे रोज पढ़ाई करता हूं।

प्रश्न: रीट का एग्जाम निरस्त हो गया था,तब आपको कैसा लगा?

उत्तर: उस वक्त मुझे बहुत डर लगा, और लोग तसल्ली देने के बजाय मजे लिया करते थे।। लेकिन मैंने सब कुछ आने वाले कल पर छोड़ दिया, जो होगा वह देखा जाएगा।

प्रश्न: आरक्षण का कोई फायदा मिला?
उत्तर:  किसी के आगे रोने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है इसलिए मैंने आरक्षण की भी आस छोड़ दी और पढ़ाई पर पूरा फोकस लगा दिया। समाज ताना मारने के अवसर की तलाश में रहता है कि कब इसको नीचा दिखाया जाए।उन्होंने ही मुझे मजबूत बनायाऔर सफल बनाने में भी उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है।

प्रश्न: आपका आगे का क्या प्लान है, क्या आप आगे पढ़ाई जारी रखेंगे?

उत्तर:  मैं आगे पढ़ाई करूंगा लेकिन उससे पहले मैं अच्छा अध्यापक बनूंगा। बच्चों को अच्छी शिक्षा दूंगा और सरकार को मुझे मिलने वाले वेतन का एक एक पाई का हिसाब दूंगा। बच्चों को उसकी रूचि के अनुसार, बिना डराए धमकाए पढ़ाने का भरसक प्रयास करूंगा।

प्रश्न: आप लोगों को क्या संदेश देना चाहते हैं?

उत्तर: कंपटीशन एक दिखावा मात्र है। तैयारी करने वाले बच्चे बहुत कम होते हैं। यदि चार-पांच महीने तक अच्छी तैयारी कोई कर ले, तो उसका चुनाव होना निश्चित है। अपनी दिव्यांगता के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि आने जाने में बहुत दिक्कत होती है लेकिन जो है उसके लिए क्या रोना। (Churu handicap Santosh Kumar Creacks REET)

अपने विचार।
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मन के हारे हार है,
और मन के जीते जीत।
कड़ी मेहनत पक्का इरादा,
यही सफलता की रीत।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

बलदेव प्रजापत एक नाम जिसने छोटी-छोटी कलाओं से चौंकाया था सबको…

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