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चूरू

आर्टिस्ट दिव्या सुथार शैला की अद्भुत चित्रकारी देख आप रह जाओगे हतप्रभ, छोटी उम्र में बड़ा काम

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अंदर की आवाज सुनो, पूछो अपने अंदर से।
क्या करना है कहां जाना है, सब बताएगा अंदर से।

दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी नन्ही कलाकार से रूबरू करवा रहा हूं। जिन्होंने अपनी मां की कला को आगे बढ़ाने का जिम्मा अपने ऊपर लिया है। चूरू जिले की रतनगढ़ तहसील में एक छोटा सा गांव शैला की रहने वाली दिव्या सुथार ने अपनी मां की कला को आगे बढ़ाते हुए चित्रकारी में एक नया आयाम जोड़ दिया है।

आपने चित्रकारी कब और कैसे सीखी।
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दिव्या ने बताया कि मैं जब छोटी थी तब से ही मां की चित्रकारी को देखकर चित्रकला में रूचि रखने लगी। सबसे पहले मैं बच्चों के कार्टून वगैरा बनाती थी। फिर स्कूल लेवल पर भी मैं चित्रकला में भाग लेने लगी। अब चित्रकला सब्जेक्ट से ही मैं बीए कर रही हूं।

शुरुआत में तो घर वालों ने मना किया लेकिन बाद में स्कूल लेवल पर मुझे इनाम और मेरी रुचि को देखकर घर वाले भी मेरे साथ है। जब बाहर कोई चित्रकला कंपटीशन होता है तो मेरे घरवाले मुझे जाने के लिए कभी नहीं रोकते हैं। मुझे साथ लेकर जाते हैं और मेरा हौसला भी बढ़ाते हैं। मैंने बहुत सी जगह पर सम्मानित हुई हूं।

आगे इसका क्या स्कोप है।
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एक भद्र महिला के चित्र को दिखाते हुए दिव्या ने कहा कि इसमें लगभग एक सप्ताह का समय लगा है। दिव्या ने इस लाइन में दो स्कोप बताएं। एक अध्यापक लाइन का और दूसरा आर्टिस्ट बनकर नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर जाने का। एक आर्टिस्ट जब अपनी चित्रकला की एग्जीबिशन लगाता है, तो उसमें लाखों लाखों रुपए की पेंटिंग बिकती है। और पेंटिंग बनाने वालों की बहुत बड़ी डिमांड है।

आपकी कौन सी चित्रकला सबसे अच्छी लगी।
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कोरोना के समय में मैंने लॉकडाउन अर्थात पूरे भारत को जंजीर में बांधकर हर क्षेत्र के योद्धाओं को जैसे डॉक्टर, नर्स, मीडिया, या देश के रक्षक सभी को चित्रकारी के माध्यम से बहुत सुंदर तरीके से दर्शाया है। मेरी इस चित्र कला को बहुत से लोगों ने सराहा था। कीमत के बारे में पूछने पर दिव्या ने बताया की एक छोटी से छोटी चित्रकला भी दस बारह हजार की बिकती है। मैं मेरी चित्र कला में वाटर कलर का यूज करती हूं।

अब आप क्या कर रही हो।
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इस समय मैं करणी माता की बाल रूप से लेकर पूरी जीवनी को चित्रकला के रूप में तैयार कर रही हूं। जिसमें बाल रूप में कैसे दिखती हैं, यौवन में कैसी दिखती हैं, और जब आखिरी के समय में दाढ़ी के अंदर करणी माता कैसे दिखाई देती है। उनका पूरा चित्रकला के माध्यम से उकेर रही हूं। जयपुर में लगे एक इंटरनेशनल कैंप के बारे में बताते हुए दिव्या कहती है कि मुझे वह कैंप बहुत अच्छा लगा। दिव्या को उस कैंप में अफगानिस्तान से आए एक आर्टिस्ट ने भी बहुत प्रभावित किया। उसने उसकी एक पोट्रेट भी बना रखी है।

अन्य।
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सिखाने के नाम पर दिव्या कहती है कि अभी मैं स्टूडेंट हूं। मैं खुद ही सीख रही हूं ।लेकिन आगे चलकर मेरा उद्देश्य वर्कशॉप चालू करने का है। वह कहती है कि मैं स्कूल लेवल पर, कॉलेज लेवल पर, और बहुत से सामाजिक समारोह में सम्मानित हुई हूं।

अपने विचार।
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चित्र तो ऐसे होते हैं,
जैसे वो मुंह से बोलेंगे।
राज जिंदगी का अपना,
सबके सामने खोलेंगे।

विद्याधर तेतरवाल, मोतीसर।

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