Connect with us

चूरू

चूरू के रतनगढ़ के श्री ताल वाले बालाजी मंदिर की कहानी

Published

on

shree taal balaji mandir ratangarh

डेढ सौ बर्ष पहले पश्चिम राजस्थान में पानी के स्त्रोत आज की पीढ़ी जो देख रही वह नहीं थे, नाडियाँ थीं,कुएं थे, तलाईयाँ थीं, जोहडे़ थे। माल-मवेशी और इनके संरक्षक दोनों के लिए पानी के मुख्य स्त्रोत यही थे।वर्तमान रतनगढ़ भी उक्त समय में ताल जैसा ही रहा।आसपास आबादी थी और फिर एक बड़ा सा ताल। हम जिस मंदिर की बात कर रहे हैं वह मंदिर रतनगढ़ में स्थित श्री ताल वाले बालाजी (Shree Taal Balaji Mandir Ratangarh) का है। मंदिर डेढ सौ बरस पुराना है। मंदिर के पुजारी बताते हैं करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले अयोध्या से धार्मिक यात्रा पर निकली एक साधुओं की टोली विश्राम के लिए रतनगढ़ में कुछ दिनों के लिए रुकी। साधु लोग को जहां अभी बालाजी की मूर्ति स्थापित है वहां चमत्कार का एहसास हुआ। ऐसा देखकर साधुओं ने वहां पर पूजा पाठ किया और यज्ञ किया तो बालाजी महाराज की प्रेरणा से उनको यह दर्शाव हुआ कि यहां पर एक मेरी मूर्ति की स्थापना की जाए। और फिर मूर्ति की स्थापना की गई।भारत में ऐसी मूर्तियां केवल दो जगह हैं एक अयोध्या में है और एक यहां रतनगढ़ में।

स्थानीय लोगों की जुबानी कि बालाजी महाराज का जो रूप है वो वीर हनुमान के रूप में है। वे भक्तों के संकट हरते हैं। उनकी मन्नतों को पूरा करते हैं। चूरु (Churu) जिले में सालासर (Salasar) के बाद सबसे ज्यादा भक्तों की जो भीड़ जो है वह यहीं ताल वाले बालाजी मंदिर के यहां होती है। पुजारी जी बताते हैं कि बालाजी महाराज का प्रतिदिन पर्चा होता है।यहाँ संध्या समय से लेकर रात ग्यारह बजे आप रुकेंगे तो मालूम पड़ेगा कि यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है।भक्त जो मन्नत मांगते हैं बालाजी उसे पूरी करते हैं।वे बताते हैं कि यहाँ 25 मई 1974 से अनवरत कीर्तन चल रहा है।ट्रस्ट के दो दो लोग अपनी ड्यूटी देते हैं।

प्रतिदिन हजारों हनुमान चालीसा का पाठ यहां होता है। चैत्र की पूर्णिमा और अश्विन की पूर्णिमा को यहां मेरे भरते हैं या कहें उत्सव होता है। एक रिकॉर्ड के अनुसार यहां पर 1 दिन में 1 लाख 85,000 हनुमान चालीसा का पाठ हो चुका है। सामान्य दिनों में प्रतिदिन तीन साढे तीन हजार लोगों का आना जाना बना रहता है। पुजारी जी बताते हैं की ताल वाले बालाजी नगर देव हैं।कोई भी व्यक्ति चाहे हुए व्यापारी हों चाहे कोई राजकीय सेवा में हो चाहे जन्म से लेकर मृत्यु तक मृत्यु तक के संस्कारों का समय हो, वे मंदिर में में आते हैं।

सालासर में जब लक्की मेला भरता है तब हनुमानगढ़ गंगानगर, बीकानेर, फाजिल्का, फिरोजपुर आदि के श्रद्धालु, पैदल श्रद्धालुओं यहां विश्राम करते हैं और 4-5 घंटे रुकते हैं।और फिर यहां खाना वाना खा कर रवाना होते हैं।उनके लिए व्यवस्थाएं हैं।मंदिर परिसर में।और यह व्यवस्थाएं पुजारी परिवार और ट्रस्ट ने कर रखी है। कुछ रात्रि विश्राम करते हैं कुछ दोपहर में। मंदिर की देखरेख की बात करें तो यहां तीन ट्रस्ट चलते हैं।

मंदिर का पुनर्निर्माण 2011 में शुरू हुआ था और लगभग अब संपूर्ण हो चुका है। गर्भ ग्रह में रखी गई मूर्ति में पत्थर का प्रयोग नहीं हुआ है। पांच-छह महीने के अंतराल में गर्भ ग्रह में रखी गई इस मूर्ति पर चोला चढ़ाया जाता है।

   
    >