Connect with us

जोधपुर

भारत माता की जय बोलने पर जाना पड़ा जेल, अंग्रेजों के खिलाफ आखिरी सांस तक खड़े रहे दानमल बोहरा

Published

on

स्वतंत्रता आंदोलन में देश के लिए वीरता का परचम लहराने वाले क्रांतिकारी किसी परिचय के मोहताज नहीं है। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ साहस की कहानियां आज भी किताबों के पन्नों में पढाई जाती है।

ऐसे ही एक क्रांतिकारी के बारे में आज आपको बताएंगे जो 16 की उम्र में ही स्वतंत्रता सेनानियों के साथ खड़े हो गए, हम बात कर रहे हैं पाली के जंगीवाड़ा के रहने वाले दानमल बोहरा जिनका जन्म 22 मई 1922 को हुआ।

स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में दानमल जोधपुर के सुमेर पुष्टीकर हाई स्कूल में पढ़ाई किया करते थे। दानमल 16 साल की उम्र में ही छठी कक्षा के दौरान ही क्रांतिकारियों से जुड़ी बातों में रस लेने लगे और एक दिन जोधपुर के गांछा बाजार पहुंचकर आजादी दिलवाने वाले एक समूह में शामिल हो गए।

भारत माता की जय नारा लगाने से मिली 7 दिन की काल कोठरी सजा

5 मई 1940 को दानमल बोहरा के बड़े भाई की शादी के दिन उन्हें आंदोलन में भाग लेने का बुलावा मिला जिसके बाद वह शादी छोड़कर जोधपुर के सर्राफा बाजार में आंदोलन में पहुंच गए और नारे लगाने लगे। पुलिस ने लाठियां बरसाई और उन्हें गिरफ्तार कर सिटी पुलिस जेल में बंद कर दिया।

कोर्ट में पेशी से पहले पुलिस वाले उनसे माफीनामा लिखवाने की कोशिश करते रहे लेकिन दानमल  ने माफीनामा नहीं लिखा और उन्हें 4 माह 7 दिन की कड़ी सजा सुनाई गई। दानमन को जिस जेल में रखा गया वह वहां भी भारत माता की जय के नारे लगाने लगे जिसके बाद उन्हें बेड़ियों में बांधकर काल कोठरी में डाल दिया जाता था।

पिता ने घर से निकाल दिया

बोहरा के पिता जवानमल राजघराने में कामदार थे और वह दानमल के क्रांतिकारी बनने से नाराज थे। उन्होंने दानमल को पढ़ाई करने को कहा लेकिन वह नहीं माने। आखिरकार उनके पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया।

देश की आजादी पर तिरंगा लेकर घूमे पूरे जोधपुर में

काफी लंबे संघर्ष के बाज जब आखिर वह दिन आया तब देश आजाद हुआ। भारत की जीत का पता लगाने के बाद बोहरा इतने खुश हुए कि उन्होंने तिरंगा लेकर पूरे शहर की परिक्रमा लगा दी। दानमल बोहरा की पांच संताने हैं। आखिर 95 साल की उम्र में 17 जुलाई 2017 में दानमल बोहरा का पाली में निधन हो गया। उनकी शव यात्रा में मानो।

   
    >