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राजस्थान

अकबर की साम्राज्यवादी नीति के खिलाफ था हल्दीघाटी युद्ध, आखिरी सांस तक डटे रहे महाराणा प्रताप

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हल्दीघाटी युद्ध की कहानी न सिर्फ राजस्थान बल्कि भारत की महानतम शौर्य गाथाओं में से एक है। एक ऐसा युद्ध जिसमे हारने वाले राजा ने भी अधीनता न स्वीकार करते हुए इतिहास में अपने आपको अमर कर दिया।

1568 ईस्वी तक भारत मे मुगलों का बोलबाला हो चुका था। बंगाल और मध्य भारत से लेकर सम्पूर्ण पंजाब और पाकिस्तान के क्षेत्र मुगलों के अधीन हो चुके थे। कई जगहों पर मुगलों का प्रत्यक्ष शासन था तो कहीं पर राजा-महाराजा खुद अकबर की पराधीनता स्वीकार करते हुए राज्य चला रहे थे लेकिन इन सबके बीच मेवाड़ के महाराजा प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया था।

आखिर तक लड़े मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप

हल्दीघाटी का युद्ध मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की सेना के बीच लड़ा गया था। अकबर ने मेवाड़ को पूर्ण रूप से जीतने के लिए 18 जून 1576 ईस्वी को आमेर के राजा मान सिंह एव आसफखां के नेतृत्व में मुगल सेना को आक्रमण के लिए भेजा।

इस युद्ध मे महाराणा प्रताप को मुख्य रूप से भील जनजाति का सहयोग मिला। अकबर और राणा के बीच यह युद्ध महाभारत के युद्ध की तरह विनाशकारी सिद्ध हुआ। ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध मे न तो राणा की जीत हुई और न ही अकबर की। मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो प्रताप के पास जुझारू घुड़सवारों एवं धनुर्धारियों की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने आखिरी समय तक अकबर से संधि की बात स्वीकार नही की।

जब महाराणा ने खाई घास की रोटियां…

दोनो सेनाओं के मध्य गोगूंदा के निकट अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के मध्य युद्ध हुआ। लड़ाई के दौरान अकबर ने कुम्भलमेर दूर्ग से महाराणा प्रताप को खदेड़ दिया तथा मेवाड़ पर अनेक आक्रमण करवाए किंतु प्रताप ने मेवाड़ के मान की रक्षा करते हुए अधीनता स्वीकार नही की।

चूंकि युद्ध महाराणा प्रताप के पक्ष में निर्णायक नहीं हो सका, खुला युद्ध समाप्त हुआ किंतु संघर्ष समाप्त नही हुआ था। युद्ध के दौरान महाराणा अपने घोड़े चेतक के साथ घायल हो गए थे ऐसे में उन्हें सैनिकों के कहने पर जंगल मे शरण लेना पड़ा। महाराणा जंगल मे लगातार संघर्ष करते रहे उन्होंने घास की रोटियां तक खाई।

युद्ध में मुगल सेना ने 150 लोगों को खो दिया। महाराणा लंबे समय तक अपने सैनिकों के साथ जंगल में रहे और जैसे ही मुगल शासक का ध्यान स्थानांतरित हुआ महाराणा प्रताप और उनकी सेना बाहर आ गई और अपने प्रभुत्व के पश्चिम क्षेत्रों को हटा लिया। यह युद्ध अकबर की साम्राज्यवादी नीति के विरुद्ध प्रताप का प्रादेशिक स्वतंत्रता का संघर्ष था। स्वाधीनता के पुजारी महाराणा प्रताप के शौर्य ने उन्हें अमर कर दिया था।

   
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