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हनुमानगढ़

MDH वाले दादाजी की हूबहू कॉपी राजस्थान के 96 साल के बुजुर्ग की मजेदार बातें और जिंदगी के राज

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hanumangarh dadaji story

आधुनिकता अब आ गई है,
समय निकल गया पुराना।
खानपान सब नकली हो गया,
वो प्यार नहीं अब आना।
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दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसे बुजुर्ग दादा जी से रूबरू करवा रहा हूं। जिनकी उम्र 96 वर्ष है तथा हनुमानगढ़ (Hanumangarh) जिले के टीब्बी गांव (Tibbi Village) में अपनी पांच पीढ़ियों के साथ में रह रहे हैं। झलको हनुमानगढ़ के प्रशांत से बात करते हुए दादा जी ने बताया कि 2 वर्ष पहले मैं अयोध्या गया था तो लोगों ने मेरे साथ में अनगिनत फोटो खींची थी क्योंकि मेरी शक्ल हूबहू एमडीएच के दादाजी की जैसी ही है।

जब एमडीएच (MDH) के बाबा जी का देहांत हुआ था। तो बहुत से लोगों ने मुझसे आकर कहा था कि आज आपके भाई का निधन हो गया है। अयोध्या के बारे में पूछने पर बाबा जी ने बताया कि वहां पर बहुत सा सामान पड़ा था, पुलिस का पहरा रहता था। वहां पर भगवान का जन्म हुआ था, आदि बातें अपनी बोलचाल में बताया।

आपका जन्म स्थान कहां पर है, पूछने पर बाबा जी ने बताया कि हमारा पुराना निवास स्थान राजगढ़ (Rajgarh) के पास में है। लेकिन 1947 में बंटवारे के समय पर जिन्ना की गंदी चाल और भगदड़ के कारण हम यहां आए हुए थे, तो यही पर रह गए। उस समय बहुत से लोग बाग मौत के घाट उतार दिए गए थे। और बहुत से लोगों का घर बार छूट गया था।

दादाजी के पास में एक सूत कातने का सांचा पड़ा हुआ था। जिसको ढेरा बोल रहे थे। दादाजी ने बताया कि इसके ऊपर सूत कातकर चारपाई बनता हूं। मेरी बुनी हुई चारपाई पड़ी हुई है। पास में पड़े हुए हीटर के बारे में पूछने पर दादाजी ने बताया कि अब तो हीटर पर तापते हैं। लेकिन पहले बहुत से लोग अलाव जलाकर ताप ते थे। मस्ती करते थे, बातें करते थे, प्यार मोहब्बत बढ़ता था। एक अलग माहौल रहता था। 1947 के बंटवारे का जिक्र करते हुए दादा जी कहते हैं कि जिन्ना के स्वार्थ ने पूरे देश का सत्यानाश कर दिया था।

खेती-बाड़ी के बारे में पूछने पर दादा जी कहते हैं कि ऊंट और बैलों से पहले खेती करते थे।कहीं जाना होता तो पैदल ही जाते थे। आज की टेलीफोन व्यवस्था को बहुत अच्छा बताया लेकिन इसमें खराबियां भी बहुत हैं। ट्रेन के बारे में पूछने पर बताया कि पहले ट्रेन लकड़ियों से चलती थी। रेलवे स्टेशन पर लकड़ियां इकट्ठी रखते थे,उनको कोयले की जगह काम में लेते थे, उनसे चलती थी। फिर बाद में कोयले से चली।

खाने पीने के बारे में बताया कि खुद पीस करके रोटियां बनाते थे। एक समय खिचड़ी बनाते थे। धोती कुर्ता और साफा का पहनावा दादा जी ने बहुत अच्छा बताया। अपने रहन सहन और नौकरी के बारे में विस्तार से बात करके बताया है। दादाजी ने वार्ड पंच का चुनाव लड़ा था तो सामने कोई नहीं खड़ा हुआ। शादी ब्याह की, प्यार मोहब्बत की, सब बात विस्तार से बताइ। यार दोस्तों के बारे में पूछने पर बताया कि मेरा कोई यार दोस्त नहीं बचा है। नहीं तो पूरा गांव ही मेरा यार दोस्त है।

अपने विचार।
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कहीं पुराना ज़माना,
तो कहीं नया अच्छा है।
खानपान और प्यार,
ये पुराना ही सच्चा है।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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