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हनुमानगढ़

हनुमानगढ़ के प्रमुख मंदिर ~ जहाँ पुरे भारत से दर्शन करने आते है।

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हनुमानगढ़ भारत के राजस्थान राज्य का एक प्रमुख जिला है, जिसकों पहले भटनेर के रूप में जाना जाता था। बीकानेर के राजा द्वारा कब्जा करने से पहले इस जगह पर भाटी राजपूत वंश का शासन था. 1805 में बीकानेर के राजा सूरत सिंह ने राजपूतों द्वारा बनाये गए भटनेर के प्राचीन किले पर जीत हासिल कर ली थी, जिसके बाद इसे हनुमानगढ़ के नाम से जाना जाता है. बता दें कि जिस दिन बीकानेर के राजा ने विजय हासिल की थी उस दिन मंगलवार था, इसलिए यहाँ स्थित हनुमान जी की एक मूर्ति के नाम पर इसका नाम हनुमानगढ़ रखा गया. अपने मजबूत इतिहास के साथ हनुमानगढ़ के मंदिर अपने कई पर्यटन आकर्षणों के लिए भी जाने जाते है. जिसमें श्री गोरख नाथ मंदिर, श्री गोगी मंदिर, सिला माता मंदिर, भद्रकाली मंदिर और ब्राह्मणी माता मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी शामिल हैं. आइये अब चलते है, हनुमानगढ़ के मंदिरों कि सैर पर……

 

सिला माता (सिला पीर मंदिर)

सिला पीर मंदिर हनुमानगढ़ शहर के बस स्टैंड के करीब स्थित एक प्रमुख मंदिर है. इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इस मंदिर में मूर्ति की पूजा हिंदू, मुस्लिम और सिख करते हैं. यहां मुसलमान लोग सिला को पीर के रूप में पूजा करते हैं और हिंदू इसे सिला माता के रूप में पूजते हैं. ऐसा माना जाता है यहां पर जो दूध और जल चढ़ाया जाता है, वो सभी तरह के त्वचा रोगों को ठीक करने में सक्षम है. आपको बता दें कि हर गुरुवार के दिन यहां पर एक मेले का आयोजन किया जाता है. माना जाता है कि मंदिर में स्थापित शिला का पत्थर घघ्घर नदी में बह कर आया था।

ब्राह्मणी माता मंदिर

ब्राह्मणी माता मंदिर हनुमानगढ़ शहर से लगभग 100 किमी की दूरी पर हनुमानगढ़ – किशनगढ़ मेगा हाईवे पर स्थित एक प्रमुख धार्मिक स्थल है. इतिहासकार बताते हैं कि यहाँ कभी सादूला नामक नरभक्षी राक्षस रहता था, जब 1308  ईस्वी में बीकानेर के राजा भोजराज एक बार अपना घोड़ा खोजते हुए यहाँ आये, तब राक्षस ने उन पर हमला कर दिया लेकिन माता ब्राम्हणी ने राजा को दर्शन देकर राक्षस को मारकर उन्हें बचा लिया. अगले दिन भोजराज ने यहाँ एक मूर्ति स्थापित कर माता की पूजा आरम्भ की. बाद में उन्होंने ने ही यहाँ एक भव्य मंदिर कानिर्माण कराया. करीब सौ साल पहले यहीं से मान सरस्वती और काली कि मूर्ती भी जमीन में से निकली थी. इतिहासकार बताते हैं कि यह मंदिर पुराने कल्लोर किले के अवशेषों पर टिका है. हर साल नवरात्रि के दौरान यहां पर माता ब्राह्मणी मेले का आयोजन किया जाता है.

श्री गोरखनाथ जी का मंदिर

श्री गोरखनाथ जी का मंदिर भगवान शिव के साथ-साथ उनके परिवार, देवी काली, श्री भैरूजी और श्री गोरख नाथजी की धूना को समर्पित है. यह मंदिर गोगामेड़ी के रेलवे स्टेशन से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य, श्री गोरखनाथ जी एक प्रतिभाशाली योगी थे. इस धार्मिक स्थल पर श्री गोरखनाथ की धूना या चिमनी देखी जा सकती है. इस मंदिर में ईंट, चूने, सीमेंट और मोर्टार से बनी देवी काली की एक खड़ी हुई मूर्ति है, जो लगभग 3 फीट ऊँची है. इसके अलावा इस मंदिर में श्री भैरूजी की भी मूर्ति है. आपको बता दें कि इन मूर्तियों के पास शिवजी के पूरे परिवार की मूर्ति विराजमान हैं. यह मंदिर पूरे साल भक्तों के लिए खुला रहता है.

माता भद्रकाली का मंदिर

माता भद्रकाली का मंदिर हनुमानगढ़ शहर से सात किलोमीटर की दूरी पर घग्गर नदी के किनारे पर स्थित एक धार्मिक स्थल है. यह मंदिर माता भद्रकाली को समर्पित है, जो देवी दुर्गा के कई अवतारों में से एक है. यह मंदिर हिंदू धर्म का एक प्रमुख मंदिर है, जिसकों बीकानेर के 6वें शासक, महाराजा राम सिंह ने अकबर की इच्छा को पूरा करने के लिए बनवाया था और बाद में बीकानेर के राजा, महाराजा धीरी गंगा सिंहजी ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया. इस मंदिर में माता की लाल पत्थर से निर्मित मूर्ति है, जो जो 2.6 फीट ऊंची है और गहनों से ढकी हुई है. यह मंदिर भक्तों के लिए हर दिन खुला रहता है. चैत्र के महीने में 8 वें और 9 वें दिन यहां पर भक्तों की काफी भीड़ होती है.

श्री गोगा जी मंदिर

इस मंदिर को हिन्दू तथा मुस्लिम दोनों सम्प्रदाय के लोग मानते हैं,. हिन्दू गोगाजी को गोगा जी देवता तथा मुस्लिम इन्हें गोगा पीर कहते हैं. हनुमानगढ़ से लगभग 120 किलोमीटर दूर, श्री गोगाजी का मंदिर स्थित है. किंवदंती प्रचलित है कि गोगाजी एक महान योद्धा थे, जो आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त किये हुए थे. उन्हें नागों का भगवान भी कहा जाता है. मंदिर के स्थापत्य में मुस्लिम और हिन्दू शैली का समन्वय एक प्रमुख विशेषता है. मंदिर अद्भुत नक्काशियों के साथ चित्रित है जिसमें अश्व की पीठ पर हाथ में बरछा लिए हुए गोगाजी की एक सुन्दर प्रतिमा है, जिसमें उनकी गर्दन के चारों और एक नाग है. यहाँ प्रतिवर्ष भाद्रपद  शुक्लपक्ष की नवमी (जुलाई – अगस्त) को मेला लगता है, जिसमें भक्त लोग पीले वस्त्र पहनकर, मीलों दूर से दण्डवत करते हुए आते हैं.

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