Connect with us

हनुमानगढ़

हनुमानगढ़ के लकड़ी के जादूगर महान कलाकार त्रिलोकचंद मांडण की कहानी

Published

on

trilokchand mandan

सन 1984 में हनुमानगढ़ (Hanumangarh) के ढंडेला (Dhandela) गांव का एक लड़का आठवीं पास करके अपने नजदीक कस्बे संगरिया मैं ग्रामोत्थान विद्यापीठ में प्रवेश बाबत गया।वहीं वह एक दिन किसी ऑफिस के पास से गुजर रहा था तो उसे ऑफिस के आगे बैल-बूंटे वाले एक गेट पर अच्छी चित्रकारी से कुछ चित्र अंकित थे।उन चित्रों के बारे में सोचते हुए वह लड़का ऐसा चित्रकार बन गया कि उसका अपना नाम हो गया।हम बात कर रहे हैं ढंडेला गांव के आर्किटेक्चर तिलोकचंद मांडण (Trilokchand Mandan) की।तिलोकचंद उस समाज से संबंध रखते हैं जिसका पुश्तैनी काम लकड़ी का है।

trilokchand-mandan

मांडण जी ने यह सन 86 से काम शुरु कर दिया।पहले-पहल उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में किसानी औजारों जैसे. – जोहडी़, पल्ला आदि बनाये।यह काम करने के बाद उन्होंने अपना पेशा मूर्ति कला की ओर मोड़ लिया और यह उनके लिए बेहतर साबित हुआ।उन्होंने बहुत अद्भुत कलाकृतियों का विरचन किया।क्रान्तिकारियों, देवी-देवताओं लोक कलाओं आदि की मूर्तियाँ उन्होंने बनायीं।

बकौल तिलोकचंद मांडण (Trilokchand Mandan) कोई भी कलाकृति बनाने में केवल एक ही प्रकार की लकड़ी का प्रयोग करते है।ऐसा नहीं है कि आधा किसी और लकड़ी का,आधा किसी और लकड़ी।एक सामान्य कलाकृति बनाने में 8 से 10 दिन का समय लगता है। विश्व की सबसे छोटी चक्की जिसको लोकभासा में ‘हटी’ कहा जाता है, मैंने अपने हाथों से बनायी है।पहले एक रिकॉर्ड में वह 8 एमएम की थी और मैं उसे 6 एमएम में ले आया। मेरा लक्ष्य रहता है कि मैं किसी कलाकृति को कितना छोटा बना सकता हूँ।

उन्होंने कई ऐसी कलाकृतियाँ बनायी जो केवल सजा कर रखने वाली नहीं है, उन्हें काम में लिया जा सकता है मसलन बिस्कुट रखने के एक बॉक्स, ड्राई फ्रूट्स रखने के लिए एक मिट्टी का बर्तन, सुराई आदि।वे सूराई के बारे में बताते हुए कहते हैं कि इसकी नाल नौ इंच की है और औजार इसके नीचे तक जाकर इसको खोखला कर गोलाई देता है।यह कला है और यह बहुत कठिन भी है।नए आदमी के लिए।पुश्तैनी परंपरा में यह केवल हाथ की सफाई है।वे कहते हैं कि जब बिल्कुल छोटी सी कोई वस्तु बनाते हैं तो आपको औज़ार भी बिल्कुल छोटे ही चाहिए होंगे।और ठीक से उसकी टेंपरिंग करना आदि एक हस्तकला है।

कच्चे मटेरियल से लेकर ठेठ कलाकृति के बनने तक का सफर हस्तकला का है।मशीन का कोई भी सहयोग नहीं है इन कलाकृतियों की निर्माण में। किस प्रकार की डिजाइन बनानी है किस प्रकार का विवेचन करना है यह हम लोगों की कल्पना पर निर्भर करता है।त्रिलोकचंद जी कहते हैं की इन मूर्तिकला के अलावा मैं एक चीज और करता हूं, वह यह है कि जैसे कोई कलाकृति बनाई और उसमें तांबा फिट कर देता हूं जिसे ‘धातु की चितराई’ करना कहा जाता है।वे कहते हैं कि मैंने पुराने आभूषण, कृषि औजार, शृंगार के सिंगारदानी आदि खूब बनाये लेकिन आधुनिक युग में उनका कोई खास महत्व नहीं रह गया।अपने जीवन की महत्वपूर्ण कलाकृतियों में उन्होंने दो MM का हल भी बनाया जो कि बहुत मेहनत का काम है।

पुराने ज़माने में हम किलों, इमारतों, हवेलियों, बवाड़ियों आदि की स्थापत्य कला देखते हैं तो अचरज में पड़ जाते हैं लेकिन ज़माना पुराना जरूर हुआ है लेकिन कला पुरानी नहीं हुई है।आज भी तिलोकचंद मांडण (Trilokchand Mandan) जैसे लोग ऐसी कलाओं की जिवित बनाए हुए हैं।विरासत के तौर पर इसे सजीवता प्रदान किए हुए हैं।सरकारों को भी चाहिए कि ऐसी वस्तुओं का संग्रहालय तैयार करें ताकि पर्यटकों के लिए शुभ अवसर पैदा हों।

Continue Reading
Advertisement
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.

   
    >