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जयपुर

मोजमाबाद : भूतों की बावड़ी से लेकर गुफा में 700 साल पुराना मंदिर, क्या आपने देखा राजस्थान का यह अनोखा गांव

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राजस्थान राजाओं और शूरवीरों की भूमि होने के साथ ही ऐतिहासिक धरोहरों और पुरातन कलाओं के लिए जाना जाता है। आधुनिकता के इस युग में मरूभूमि की आत्मा आज भी गांवों में बसती है। राजस्थान के दूर-दराज तक फैले गांव ऐतिहासिक महत्व रखने के साथ ही एक विरासत के गवाह है।

झलको राजस्थान टीम के साथ आज हम आपको लेकर चलेंगे एक ऐसे गांव में जिसके बारे में लिखने लगे तो शब्दसीमा भी कम पड़ सकती है।

हम बात कर रहे हैं राजस्थान की राजधानी जयपुर से अजमेर रोड़ पर स्थित 60 किलोमीटर दूर बसा मोजमाबाद, जो राजा मानसिंह प्रथम की जन्मस्थली होने के साथ ही ऐतिहासिक विरासत को सहेजने और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करता है। राजस्थानी संगीत और लोक नृत्यों की थाप यहां की हवा में आज भी गूंजती है।

मोजमाबाद में बीता राजा मानसिंह प्रथम का बचपन

राजपूतों का मुगलों के साथ सहयोग सन् 1562 ई. में प्रारम्भ हुआ था जिसके बाद आमेर राजस्थान का प्रथम राज्य बना जहां मुगलो के साथ सहयोग और सर्मपण की नीति अपनाई गई।

आमेर के कछावाहा शासक राजा भारमल ने 1562 ई. में अकबर की अजमेर यात्रा के दौरान वर्तमान सांगानेर के निकट अकबर की अधीनता स्वीकार किया जिसके बाद अपनी पुत्री जोधाबाई की शादी अकबर से कर मुगलों के साथ सहयोग की नीति की शुरूआत की।

राजा भारमल के पौत्र तथा राजा भगवन्तदास के पुत्र कुंवर मानसिंह का सम्राट अकबर से परिचय 1562 ई. में हुआ। मानसिंह का जन्म 2  दिसम्बर 1550 ई. को मोजामाबाद में हुआ था। मानसिंह के बारे में कुछ भी बताने से पहले स्थानीय लोग नीचे लिखी इन लाइनों से अपनी बात शुरू करते हैं।

जननी पूत जने तो ऐड़ा जण

जेड़ो मान मरद

समुद्र खाडो पखालियो

काबुल बांधी हद

मानसिंह का बचपन आमेर से मोजमाबाद में ही बीता जहां उन्होंने शस्त्र विद्धा के साथ उन्हें हिन्दी, संस्कृत एवं फारसी भाषाओं में पारंगतता हासिल की।

इसके बाद 12 साल के किशोर मानसिंह को आगरा में शाही सेवा में रखकर अकबर ने प्रशिक्षण दिया और एक क्षत्रिय राजकुमार के सारे गुर सिखाए। आखेट मानसिंह का विशेष शौक बताया जाता है। किशोरावस्था में उन्होंने अपने इस शौक को आमेर और फिर आगरा में पूरा किया।

मानसिंह ने मुगल साम्राज्य के सेनानायक और सूबेदार के रूप में सेवा की। वह अकबर के सर्वाधिक विशवस्त सेनानायक माना जाते थे। मुगल सम्राट अकबर के समय जिन राजपूत शासकों ने मुगलों को सहयोग किया उनके मानसिंह का योगदान सर्वोपरि माना जाता है। 1589 में मानसिंह ने आमेर का शासन संभाला।

7 नंबर से मोजमाबाद का गहर नाता

मोजमाबाद के नाम के पीछे के इतिहास पर रोशनी डालते हुए एक स्थानीय कहते हैं कि 973ई. में एक परमार शासक राजा मोंज हुआ करता था जिसने मोंज बसाया था जिसके बाद साल दर साल यह मोंज से मोजाद होते हुए मोजमाबाद हो गया।

वहीं मोजमाबाद की बनावट में 7 नंबर का खास महत्व है, कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि गांव में पुरातन काल के शासकों ने 7 नंबर को शुभ माना जिसके बाद यहां 7 बावड़ी, 7 मंदिर, 7 मस्जिद, 7 तालाब बनाए गए।

1300 साल पुरानी भूतों की बावड़ी है सालों से रहस्य

मोजमाबाद में पानी की व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाए रखने के लिए राजा के शासन काल से ही तालाब और कई बावड़ियां बनाई गई. गांव में जगह-जगह जल संग्रहण के लिए बावड़ी बनी हुई है।

वहीं स्थानीय लोगों के बीच “भूतों की बावड़ी” काफी रोचक है जिससे जुड़े किस्से आसपास रहने वाले सुनाते हैं। बावड़ी के पास रहने वाली कोमल बताती है कि इस बावड़ी का निर्माण एक रात में हुआ है और इसकी नींव लकड़ी से डाली हुई है।

वहीं कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि बावड़ी के अंदर नाग-नागिन का जोड़ा रहता है जो हर साल पूर्णिमा के दिन दिखाई देते हैं।

गांव के एक टीचर बताते हैं कि करीब 1300 साल पुरानी इस बावड़ी के निर्माण को लेकर कई तरह के किस्से हैं, किवदंतियां है। वह एक ऐतिहासिक तथ्य बताते हुए कहते हैं कि परमार फौज के सैनिकों की एक टुकड़ी मोजमाबाद में रूकी थी जिसके लिए सेना ने पानी की जरूरत पूरा करने के लिए रातोंरात इस बावड़ी को बनाया था।

500 साल पुरानी गुफा में जैन मंदिर

मोजमाबाद में पुरातन काल से ही हवेलियां, किला बनी हुई है। इसके साथ ही मंदिरों, मस्जिद बनने के साथ यह गांव ऐतिहासिक तौर पर सालों से गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल है। गांव में बना 500 साल पुराना दिगंबर समाज का जैन मंदिर आकर्षण का केंद्र है जिसे गुफाओं का मंदिर भी कहा जाता है।

मंदिर के संरक्षक बताते हैं कि यहां जैन समाज के तीन भगवानों की मूर्तियां स्थापित की हुई है जिनकी बनावट एक अद्भुत कारीगरी का नमूना है। मंदिर के बरामदों में दीवारों और छत पर नायाब चित्रकारी भी उकेरी हुई है। वह आगे बताते हैं कि यहां हर मूर्ति और आकृति का सालों पुराना महत्व है। महावीर जयंती के मौके पर यहां देशभर से लोग आते हैं।

न्याय का चबूतरा जहां नहीं होता था भेदभाव

गांव के लोंगों ने बताया कि गांव में आज भी न्याय का चबूतरा मौजूद है। यहां पहले राजा न्याय करते थे जब गांव में दो पक्षों के बीच कोई बातचीत बिगड़ जाती थी। तब यहां न्याय होता था।

इसके अलावा गांव के लोगों का मानना है कि इस हवेली में आज भी खाजाना मौजूद है। यहां से एक सुरंग निकलती है जिसमें आज भी खजाना मौजूद है।

52 परिवार की हवेली भी है मौजूद

वहीं गांव के अंदर 52 चूल्हा की हवेली भी मौजूद है लेकिन अब इस हवेली की हालत अब खंडहर हो चुकी है, लेकिन गांव के लोग बताते हैं कि यहां पहले 52 परिवार एक साथ रहा करते थे और इसीलिए 52 चूल्हा इस हवेली का नाम पड़ा था।

हवेली के तार मोतीलाल पंचोली के साथ जोड़े जाते हैं, कहा जाता है कि उन्होंने गांव के लिए कई काम भी किए थे। लेकिन बाद में उन्होंने अपने परिवार वालों को इसे संभालने के लिए दे दिया।

   
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