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जयपुर

कच्ची चांदी की तरह चमकती सांभर झील जिसमें ऐसे निकलता है नमक

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हिन्दी के एक विलक्षण कवि प्रभात का एक चर्चित गीत है जो नमक की प्रासंगिकता और उसके उपयोग के सौंदर्य पर बात करता है, जिसका कुछ अंश यहाँ जोड़ना सुन्दर होगा।

“साँभर झील से भराया । भैंरु मारवाड़ी ने ।। बंजारा नमक लाया ऊँटगाड़ी में ।।

बर्फ़ जैसी चमक । चाँद जैसी बनक ।। चाँदी जैसी ठनक । अजी देसी नमक ।।देखो ऊँटगाड़ी में । बंजारा नमक लाया ऊँटगाड़ी में ।।

कोई रोटी करती भागी । कोई दाल चढ़ाती आई ।। कोई लीप रही थी आँगन । बोली हाथ धोकर आई ।। लायी नाज थाली में । बंजारा नमक लाया ऊँटगाड़ी में

थोड़ा घर की खातिर लूँगी । थोड़ा बेटी को भेजूँगी ।। महीने भर से नमक नहीं था । जिनका लिया उधारी दूँगी लेन-देन की मची है धूम ।। घर गुवाली में बंजारा नमक लाया ऊँटगाड़ी में

साथियों आज हम जयपुर से करीब 80 कीमी दूर स्थित सांभर झील की बात कर रहे हैं सांभर झील का अपना एक इतिहास है और वह इतिहास कहता है कि यहाँ असुर राज वृषपर्वा के साम्राज्य का एक हिस्सा था और असुरों के कुलगुरु शुक्राचार्य रहते थे। इसी जगह पर शुक्राचार्य की बेटी देवयानी का विवाह नरेश ययाति के साथ हुआ था। झील के पास ही एक मंदिर भी है जो देवयानी को समर्पित है।

पूरे भारतवर्ष में दूसरा सबसे ज्यादा नमक निकलने वाला स्थान अपने स्पाट मैदान के लिए भी प्रसिद्ध है।लगभग 90-95 वर्गमील में फैली यह झील समुद्रतल से 1200 फुट की ऊंचाई पर है।कभी चौहानों की इष्ट स्थली रही सांभर में झील के आसपास दोपहर के वक़्त यदि हम देखते हैं तो लगता है किसी चांदी की चमक को देख रहे हैं और वह यह देखना आंखों के लिए असहनीय होता है।इतनी ज्यादा चमक।

नमक निर्माण की प्रक्रिया:

नमक को यदि आप बरसात के पानी से विरचन चाहते हैं तो वह जमीन के स्पर्श से स्वत: खारा होता रहता है। और फिर पंपिंग द्वारा ट्रांसफर करके दूसरी जगह डिवाइड कर दिया जाता है।और फिर उन्हें क्यारियों में बांट दिया जाता जाता है।और फिर शुरू होता है नमक निर्माण।ट्रेन के डिब्बों से नमक को तीन किलोमीटर की दूरी पर ले लाया जाता है और वहाँ से निर्यात का मसला शुरू होता है।एक साथी बताते हैं कि कभी यहाँ कुछ नदियों का संगम हुआ करता था।इसमें चार नदियाँ – रुपनगढ,मेंथा,खारी,खंड़ेला आकर गिरती हैं।सीकर तक का पानी यहाँ इक्ट्ठा होता था।मध्यकाल में यह क्षेत्र भील राज्य का प्रमुख व्यावसायिक केंद्र रहा।एक जानकारी के मुताबिक अरावली के शिष्ट और के गर्तों में भरा हुआ गाद (silt) ही नमक का स्रोत है। गाद में विलयशील सोडियम वर्षा के जल में घुसकर नदियों द्वारा झील में पहुँचाता है और जल के वाष्पन की विधि द्वारा झील में नमक के रूप में रह जाता है।

नमक निर्माण में मजदूरी करते कुछ लोगों से जब बात हुई तो उन्होंने दयनीय भाव से बताया कि ठेकेदार अपने हिसाब से पैसा देते हैं।एक डिब्बा भरने के 100-150 रुपये मात्र।और मेहनत बहुत सारी।सांभर झील और शाकम्भरी माता मंदिर दर्शनार्थ आप सड़क रास्ते – जयपुर से आ सकते हैं।जयपुर से यह 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।आप रेल द्वारा भी सांभर पहुंच सकते हैं।सांभर झील, दिल्ली, आगरा, मुंबई, चेन्नई, बीकानेर, जोधपुर, उदयपुर, अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों के रेलवे स्टेशनों से जुड़ा हुआ है।

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