21 सालों से रोज गोवंशों की सेवा कर रहे हैं जैसलमेर के कांतिभाई, रोज खिलाते हैं 2 क्विंटल चारा

Jaisalmer: निस्संदेह, इंसान का सबसे बड़ा धर्म मानवता है। यही कारण है कि मनुष्य के बीच अन्य जीव जंतु भी प्यार से रहते हैं। यही मिला-जुला रूप इंसान को सामाजिक प्राणी बनाता है। जीव-जंतुओं की सेवा करना भारतीय परंपरा का एक हिस्सा रहा है। इसी परंपरा का निर्वहन गुजरात (Gujarat) के जूनागढ़ (Junagarh) के रहने वाले 60 वर्षीय बुजुर्ग कांतिभाई बखूबी कर रहे हैं। तड़के भोर कांतिभाई गोवंशों को 2 क्विंटल चारा खिलाने के लिए नंगे पाव निकल (kantibhai daily feeds to cows in Jaisalmer) पड़ते हैं और दोपहर तक चयनित जगहों पर गोवंश के लिए चारा डाल वापस लौट आते हैं। खास बात यह है कि कांतिभाई रोजाना सूरज की पहली किरण के साथ रूटिन से, यह पुण्य वर्षों से करते आ रहे हैं। फिर भले ही सर्दी हो, गर्मी हो या बरसात कांतिभाई कभी भी अपने कर्तव्य का पालन करने से नहीं चूकते। मौजूदा वक्त मे कांतिभाई जैसेलमेर (Jaisalmer) के रामदेवरा (Ramdevra) गांव में रहे रहे हैं। स्थानीय लोग कांतिभाई को कांति बापू भी कहकर पुकारते हैं।

लोगों के मुताबिक, रामदेवरा में कांतिभाई यह कार्य 21 साल से करते आ रहे हैं। उनके इस काम की लोग जमकर तारीफ करते हैं, गांववालों का इस संबंध में कहना है कि कांति भाई का यह काम बेहद सराहनीय है, वह जिस प्रकार निस्वार्थ ढंग से गोवंशों के सेवा में वह तल्लीन है, इसके लिए उनकी जितनी तारीफ की जाए कम है।

ये जगहे हैं खास

कांतिभाई रामदेवरा क्षेत्र में पर्चा बावड़ी, रेलवे स्टेशन, जाट धर्मशाला, रुणीचा कुआं रोड़, नाचना चौराहा की सड़क किनारे, हाइवे पर बिजलीघर के पास, गोवंश के लिए 2 क्विंटल चारा डाल गोवंशों का पेट भरते हैं। बेजुबान भी सुबह से कांतिभाई का बेसब्री से इंतजार कर रहे होते हैं, और कांतिभाई को देखते ही वे उनके आसपास इकट्ठा हो जाते हैं। कांतिभाई (kantibhai daily feeds to cown in jaisalmer) बताते हैं कि पंच पीपली के पास, उदावत नगर दूधिया, फलोदी रोड़, पोकरण रोड़, गलर तालाब के पास, जैसी तमाम जगहों पर गोवंशों के लिए पानी की व्यवस्था के लिए टैंकर द्वारा पानी का भी इंतजाम करते हैं।

नहीं मांगा कभी चंदा

पिछले 25 साल से रामवेदरा में रह रहें कांतिभाई बताते हैं कि यात्री और स्थानीय व्यापारी जो भी राशि देते हैं, उसी के द्वारा वह चारे और पानी की व्यवस्था करते हैं। वह रोजाना तकरीबन 3 से 5 हजार रुपए पानी और चारे में खर्च करते हैं। वह कहते हैं कि वह पानी और चारे के लिए कभी चंदा (kantibhai daily feeds to cows in Jaisalmer) लेने नहीं जाते, कभी ऐसा दिन भी आया कि उनके पास एक पैसा नहीं था, लेकिन उन्होंने चारे और पानी की सेवा को बंद नहीं होने दिया। ऐसे में उन्होंने उधार लेकर गोवंशों की सेवा की।

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