जैसलमेर की शान और बिना किसी चूने व सीमेंट से बने सोनार के किले की कहानी

गढ़ दिल्ली, गढ़ आगरो, अधगढ बीकानेर
भलो चिणायो भाटियां सिरै तो जैसलमेर

उक्त दोहा जैसलमेर के सोनार किले के लिए कहा जाता है

स्वर्णिम दुकाल का श्रंगार किए हुए रेगिस्तान के बीच में खड़ा यह किला भाटी राजवंश के इतिहास व वहां के लोगों की कला , संस्कृति का दर्शक रहा है।यह बिना किसी चूने व सीमेंट से निर्मित हुआ था।पत्थर के खांचों में पत्थर डालकर इसे खड़ा किया गया था।सोनार किले का निर्माण राव जैसल द्वारा 1156 में किया गया था।जैसलमेर रेशम मार्ग में पड़ता था।जैसलमेर किले पर कई विदेशी आंधियां कभी मंगोल तो कभी तुर्क के रूप में आई और उससे टकराकर वापस चली गई।हिन्दुस्तान को कई बार बचाया।

जैसलमेर किला भारत के सबसे प्राचीन किलों में से एक है। इतिहास के मुताबिक गौर के सुल्तान उद-दीन मुहम्मद ने अपने सूबे को सेफ करने के लिए राजपूत शासक रावल जैसल को अपने एक ष’ड्यंत्र में फंसा दिया और उन पर आक्र’मण कर दिया तत्पश्चात उनके किले पर अपने डोरे डालकर इसे लू’ट लिया।इसके साथ ही उन्होंने उस किले में रह रहे लोगों को जबरन बाहर निकाल दिया एवं उस किले को पूरी तरह ध्व’स्त कर दिया।इस घटना के बाद सम्राट जैसल ने त्रिकुटा के पहाड़ पर एक नया किला बनाने का फैसला लिया इसके लिए उन्होंने पहले जैसलमेर शहर की नींव रखीं और फिर उसे अपनी राजधानी घोषित किया।यूं सोनार किला राजपूत व इस्लाम मिश्रित स्थापत्य शैली और पीले बलुआ पत्थर से निर्मित हुआ है।

प्राचीन समय में सारा शहर किले में ही बसा करता था।सतहरवी शताब्दी के आसपास आते आते किले के बाहर बस्तियां बसनी शुरू हुई।आज भी कई परिवार किले के भीतर रहते है।यह विश्व के सबसे बड़े कॉलोनाइज किलों में से एक है।इतने प्राचीन किलों में से कई किले ख़तम हो गए लेकिन यह अभी भी अपना खाका लेकर खड़ा है हालांकी पिछले कुछ दशकों से किले में जर्जरपन आना शुरू हुआ है। इसमें कई हवेलियां व मंजिलें है जो कि अव्वल नक्काशी का जीवंत उदाहरण है।किले की सुरक्षा के लिए नीचे चार तो’प रहित द्वार व किले की प्राचीर पर भी तो’प की सुरक्षा हुआ करती थी।इस किले पर दूसरा हमला मुगल सम्राट हुमायूं के द्धारा सन 1541 में किया गया। और राजा रावल ने मुगल शासकों की शक्ति और ताकत को देखते हुए मुगलों से दोस्ती करने का फैसला लिया |मुगलों के साथ अपने रिश्ते अच्छे करने के लिए राजा रावल ने अपनी बेटी का विवाह मुगल सम्राट अकबर के साथ करवा दिया।जैसलमेर किले पर सन 1762 तक मुगलों का शासन रहा।

आधुनिक काल में देश विदेश से कई यात्री इस किले के दर्शन के लिए आते है।जब सूरज की किरणे इसपर पड़ती है तो इसकी स्वर्णिम आभा चमक उठती है।लगभग 460 मीटर लंबा व 230 मीटर चौड़ा यह किला उत्कृष्ट निर्माण कला और संस्कृति का द्योतक है।सोनार किला रेगिस्तान का आभूषण है। यह रेगिस्तान के मध्य गौरव बन खड़ा है। राव जैसल द्वारा इसका निर्माण शुरू करने के पश्चात पूर्ण स्वरूप शालीवाहन द्वारा दिया गया।इसके भीतर कई मंदिर जनसाधारण हेतु मकान बनाएं हुए है।जिनमें आज भी शहर का एक चौथाई हिस्सा रहता है।इस किले के चारो तरफ दीवार और चारों तरफ प्रोल का निर्माण करवाया गया है।दुर्ग का मुख्य द्वार अखैपोला है।यह किला भाटी राजवंश का इतिहास कहता है।इतिहास के मुताबिक अलाउद्दीन ने नौ साल यहाँ राज किया।1965 व 71 के युद्ध में भी यह किला लोगों के शरणस्थली बना।किसी काल में सिल्क मार्ग के साथ जैसलमेर का किला एक महत्वपूर्ण व्यापार और व्यवसायिक पड़ाव बन गया था।

भड़ किंवाड़ उतराधरा, भाटी झालण भार
वचन राखो ब्रिजराजरा, सेहमर बांधो सार

दुर्ग परिसर के ठीक नजदीक दीवान सालिम सिंह की हवेली स्थित है।ये वही सालिम सिंह हैं जिसके कारण कुलधरा सहित पालीवालों के चौरासी गाँव पलायन कर गये थे।कुलधरा भूतिया जगह बन गया कालांतर में।किले के आसपास कई हवेलियाँ बनायी गयी है जैसे. – पटवों की हवेली, नथमल की हवेली आदि।किले में कई पोल हैं जिन्हें शायद लोक भाषा में प्रोळ कहा जाता है।किले के अंदर लक्ष्मीनाथ जी का प्राचीन मंदिर स्थित है।और भी कई मंदिर किले के भीतर निर्मित है जिनमें जैन मंदिर प्रमुख है।

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