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जालौर

अभेद जालौर के किले की शौर्य की गाथा और वीरांगनाओं के जौ’हर के साक्षी किले की कहानी

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किसी भी राजवंश और राज्य के लिए किला होना सम्मान, समृद्धि, संस्कृति ,वैभव,शौर्य,परम्परा और रक्षा का प्रतीक हुआ करता था. जब कभी किसी राज्य पर आक्र’मण होता था तब उनके लिए पहली चुनौती किला हुआ करता था।कई यु’द्धों में बेहतरीन किले होने की वजह से राज्य बच गए।राजा हमेशा अभेद किले व बड़ी प्राचीर बनाते थे ताकि वो ध्व’स्त ना हो।राजस्थान राज्य में एक से एक बेहतरीन किले है. कहीं खूबसूरत तो कहीं विशाल एक तरफ आमेर का किला है तो दूसरी तरफ सिवाना का किला।

राजस्थान वाकई एक से एक ऐतिहासिक किलों को अपने भीतर बसा कर बैठा है पश्चिमी राजस्थान में अरावली पर्वत श्रंखला की सोनगिरि पहाड़ी पर सूकड़ी नदी के किनारे जालौर का स्वर्णगिरी किला विद्यमान है। सोनगिरि पहाड़ी पर निर्मित होने के कारण किले को सोनगढ़ भी कहा जाता हैं। प्राचीन शिलालेखों में जालौर का प्राचीन नाम जाबलीपुर और किले का नाम स्वर्णगिरी है। जिसका निर्माण दसवीं शताब्दी में हुआ।

इस ने अपने जीवनकाल में गुर्जर प्रतिहार, चालुक्य, चौहान, परमार , राठौड़ राजवंशों को पनाह दी.जालोर किला परमार राजवंश द्वारा बनाया गया था।दसवीं शताब्दी में पश्चिमी राजस्थान में परमार राजवंश सबसे शक्तिशाली हुआ करता था। यह शहर से 360 मीटर ऊंचाई पर स्थित है।किले में प्रवेश के लिए चार शक्तिशाली द्वार या पोल बने हुए हैं।सूरज पोल, ध्रुव पोल, चांद पोल और सीर पोल।सूरज पोल या “सूर्य द्वार” इस प्रकार बनाया गया है कि सुबह की सूर्य की पहली किरणें इस प्रवेश द्वार से प्रवेश करती हैं।किले के भीतर प्रत्येक दरवाजा सुरक्षा की दृष्टि से निर्मित हुआ है. किले के भीतर कई सै’निक आवास भी थे.

जालौर के किले के लिए दोहा कहा जाता है कि “आभ फटै धर उल्टै कटै बगत रा कोर, सीस पड़ै धड़ तड़फड़ै जद छूटै जालौर” आसमां फट जाए , धरा उलट जाए , बगत टूट जाए सर धड़ से अलग हो जाए लेकिन जालौर समर्पण नहीं करेगा. लेकिन 1311 में जब अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर आक्र’मण कर इसे नेसतनाबूद कर दिया।भीषण यु’द्ध हुआ जिसमें हजारों राजपूत सै’निक श’हीद हो गए क्षत्राणियों ने अपनी अस्मिता बचाने के लिए जौ’हर कर दिया।

यह रेगिस्तान के नौ दुर्गों में से एक है. किले में हिन्दू व जैन धर्म के मंदिरों के अलावा मस्जिद भी है। जालौर के गौरवशाली इतिहास का साक्षी यह स्वर्णगिरि किला जो समय के थपेड़ों से अपनी समृद्धि खो खंडहर बन चुका है। किले के हर खंडहर पर इतिहास के कई दृश्य अंकित है. हर पत्थर कोई ना कोई कहानी कहता प्रतीत होता है।

“विषम दुर्ग सुणीह घणा, ईसीऊ नहीं आसेर जिसत जालहुर जाणीई, तीसउ नहीं ग्वालेर”

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