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झुंझुनू

23 की उम्र में देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीद ईश्वर राम, घर आए थे सिर्फ खून से सने कपड़े

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आज हम आपको एक ऐसे जांबाज वीर की कहानी बताने जा रहे हैं जिसने उम्र के सारे बंधनों को तोड़कर साहस और वीरता का परिचय दिया। हम बात कर रहे हैं शहीद ईश्वर राम की जिन्होंने महज 23 साल की उम्र में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।

शहीद ईश्वर राम का जन्म 28 अप्रैल 1949 को झुंझुनूं जिले के मोतीसर गांव में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। ईश्वर राम के पिता का नाम चौधरी भिंवा राम तथा माता का नाम रामादेवी था।

ईश्वर राम की शुरूआती शिक्षा गांव के पास ही राजकीय प्राइमरी स्कूल तोलियासर में हुई। शिक्षा की तरफ ध्यान विशेष नहीं होने के कारण उन्होंने अपना पूरा फोकस सेना में जाने पर लगा दिया। खेलकूद में विशेष रूचि होने के कारण वे शारीरिक रूप से सेना के लिए फिट बनने लगे। आगे फिर ईश्वर राम की शादी भोमपुरा की समा कोरी के साथ 1970 में हुई।

शहीद होने के बाद घर आए थे सिर्फ कपड़े

ईश्वर राम ने 28 अप्रैल 1969 को 4 जाट रेजीमेंट ज्वाइन की और ट्रेनिंग पूरी करने के बाद जम्मू कश्मीर में अपनी ड्यूटी को अंजाम देते रहे। 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान ईश्वर राम की सीने में गोली लगने की वजह से 5 दिसंबर 1971 को मौत हो गई। शहीद होने के बाद उनके परिजन उनके अंतिम दर्शन तक नहीं कर सके थे, केवल कपड़े घर पर खून से सने कपड़े पहुंचे थे।

सरकार हमें भूल गई : शहीद की पत्नी

शहीद की पत्नी एक बातचीत के दौरान बताती है कि 50 साल बीतने के बाद भी सरकार ने कभी हमारी सुध नहीं ली। हालांकि ईश्वर राम की यूनिट की तरफ से हर साल या जब भी कोई विशेष उत्सव होता है, शहीद परिवार को बुलाया जाता है।

पत्नी आगे बताती है कि ईश्वर राम के शहीद होने के बाद हमें नौकरी, सड़क बनाने तक कई वादे किए गए लेकिन सरकार ने हमारी कभी सुध नहीं ली।

हालांकि एक साल बाद मोतीसर गांव की प्राइमरी  स्कूल का नामकरण शहीद के नाम से हुआ और भाजपा नेता प्रेम सिंह बाजौर ने उनकी मूर्ति भी बनवाई है। लेकिन नौकरी का वादा भी सरकार ने किया था पर एक साल तक विभागों के चक्कर लगाने के बाद परिवार ने हार मान ली।

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