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झुंझुनू

शेखावाटी के साईं बावलिया बाबा के चमत्कार, परमहंस गणेशनारायण द्वारा बिड़ला को दिए आशीर्वाद की कहानी

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हम आज आपको कहानी बताएंगे परमहंस गणेशनारायण की। बुगालो में जन्मे परमहंस गणेश नारायण जिन्हें बाद में बावलिया बाबा के नाम से जाना गया। विक्रम संवत 1903 पौष बद्री प्रतिपदा को गुरुवार के दिन परमहंस गणेश नारायण जी का जन्म हुआ। उन्होंने ब्राह्मण कुल में घनश्याम दास और गौरादेवी के यहां जन्म लिया। बचपन से ही परमहंस गणेश नारायण जी तेज और तीव्र दिमाग के थे।

बाल व्यवस्था में ही परमहंस गणेश नारायण जी ने वेदों पुराणों के साथ व्याकरण और ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त कर लिया। बताया जाता है कि नवरात्रि में व्यवधान उत्पन्न होने के कारण उनकी पूजा भंग हो गई। इसके बाद वह राजस्थान के गुढ़ागौड़जी आ गए और 13 महीने तक वहां की पहाड़ियों में ही भगवान की तपस्या की।

वहां से वह चिड़ावा की ओर चल दिए और चिड़ावा में उनका मन ऐसा लगा कि उन्होंने चिड़ावा को शिव नगरी का नाम दे दिया। उन्होंने पूरी तरीके से अघोरी का रूप ले लिया और मां दुर्गा की पूजा अर्चना शुरू कर दी। मां दुर्गा के उपासक बन गए, बताया जाता है कि चिड़ावा में वह दुर्गा माता का दिन-रात पाठ करते जिसके चलते लोग उनकी भक्ति को मानने लगे। लोग उनके ही भक्त हो गए वह जो भी बोल देते वह सत्य हो जाता।

साथ ही कोई घटना अगर घटित होती तो, उसको पहले ही वह बता दिया करते। जिससे इन लोगों में डर पैदा हो गया, लोग कहते थे कि वह पहले ही घटित होने वाली घटना को बता देते हैं। परमहंस गणेश नारायण जी के चमत्कार को लोग मानने लगे और उनकी भक्ति को देख लोग कहते हैं कि वह बावले हो गए हैं। जिसके बाद उनका नाम बावलिया बाबा रख दिया गया।

बताया जाता है कि बिरला परिवार के जुगल किशोर बिरला परमहंस गणेश नारायण जी की रोजाना सेवा करते थे। वह पिलानी से चिड़ावा बाबा से रोज मिलने आया करते थे। बाबा को खाना खिलाते, साफ सफाई करते तथा उनकी निस्वार्थ सेवा करते। उनकी सेवा से खुश होकर बिड़ला को परमहंस गणेश नारायण जी ने आशीर्वाद दिया और उन्हें आशीर्वाद स्वरुप कहा कि तेरी करणी भरणी हमेशा चालू रहेगी। इसी के चलते पूरी दुनिया में आज बिरला परिवार का नाम हो गया। बताया जाता है कि परमहंस गणेश नारायण जी को जुगल किशोर बिरला ने कई बार पिलानी चलने के कहा, लेकिन परमहंस गणेश नारायण जी तो चिड़ावा में ही अपना मन लगा चुके थे।

संवत 1969 पौष सुदी नवमी गुरुवार के दिन बावलिया बाबा ने चिड़ावा में अपना शरीर त्याग दिया। उनकी याद में बिड़ला ने जोहड़ खुदवा कर घाट बनवाया और उस पर एक ऊंची गणेश लाट नाम की स्तूप बनवाई। बताया जाता है कि स्तूप से पिलानी साफ दिखता था और पिलानी से बिरला बाबा के मंदिर के रोजाना दर्शन करते थे।

आज दुनिया में परमहंस गणेश नारायण बावलिया बाबा के करोड़ों भक्त हैं। उनकी जन्म स्थल बुगालो में उनका एक म्यूजियम भी है। जिसे मुंबई के एक ट्रस्ट द्वारा संचालित किया जाता है। उनके मंदिरों की बात करें तो उनका मंदिर बुगालो विद्यास्थली नवलगढ़, तपोस्थली गुढ़ागौड़जी, समाधि स्थल चिड़ावा के साथ-साथ खेतड़ी, पिलानी, मुकुंदगढ़, बांस गुड़ीवाड़ा, कोलकाता, हैदराबाद, अहमदाबाद, ग्वालियर, सूरत, मुंबई में भी स्थित है। लोग आज भी बाबा के चमत्कारों को मानते हैं और उनकी बाबा में आज भी सच्ची आस्था है। उनके चिड़ावा स्थित मंदिर में मेला भरता हैं। करोड़ो लोग उनकी पूजा करने आते हैं।

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