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झुंझुनू

झुंझुनू के 95 साल के बोयतराम जी की फौजी जीवन की संघर्ष भरी कहानी

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गाँव भोडकी (Bhorki), तहसील उदयपुरवाटी (Udaipurwati) जिला झुंझुनूं (Jhunjhunu)। भोडकी के बोयतराम (Boyatram) की उम्र अब पिचानवे (95) पार कर गयी लेकिन अभी भी ही ठीक से बोलने में समर्थ है।बोयतराम को उस समय के अन्य सिपाहियों की तरह भर्ती किया गया, वे अनपढ़ थे।निपट एकदम।गरीबी खाये जा रही थी और इसी दरमियान गाँव में एक समाचार मिला कि पास के एक गांव जो अब कस्बा बन चुका, नीमकाथाना में अं’ग्रेज सि’पाहियों को सेना में भर्ती कर रहे है जवानों को।बोयतराम भी शामिल हो गये।भर्ती किया गया।और बीस बीस रूपये दिए गए दिल्ली जाने हेतु, बीस बहुत होते थे उस वक़्त।खाना पीना सब समा जाता था।बोयतराम के पिता फौज में थे, उन्हें पांच रुपये महीने का वेतन मिलता था।

ख़ैर दिल्ली में चार महीने का प्रशिक्षण और फिर भेज दिया दक्षिण अफ्रीका (South Africa)।समुद्री जहाज से।फौज की नौकरी के अपने अनुभव और डरा’वने अनुभव हैं पर वहाँ खाने पीने के मामले में कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती।खूब खाओ, पीओ और अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करो।बोयत जी कहते हैं कि आधा किलो फ्रूट, एक किलो दुध प्रति दिन मिलता था।

हमारा आवागमन यूनिट की गाड़ी से होता था।से’ना की टुकड़ियों में हमारे इलाके लगभग सभी समुदायों के लोग शामिल थे।मछली का साग मिल जाता,देसी घी खाने को मिल जाता और चाहिए ही क्या? उस समय ये सभी गाँव जयपुर (Jaipur) जिले के अंदर आते थे।नवलगढ़ (Nawalgarh) पोस्ट ऑफिस था।

स्वतंत्रता आं’दोलन के समय का एक किस्सा बताते हुए बोयतराम (Boyatram) कहते हैं कि एक बार दिल्ली में गांधी जी ने पोस्ट ऑ’फिस ज’ला’ने के लिए जु’लूस निकाला इसके प्रतिकार में अँग्रे’जी शा’सन ने हमें जु’लूस पर गो’ली’बा’री के लिए भेजा तो हमने बातचीत की उनसे लेकिन गो’ली नहीं मारी, कैसे मारें गो’ली? अपनों को मा’र’ना? मन नहीं करता था।जब जुलूस तक पहुंचे तो नेतृत्वकारी गांधी ने कहा कि ह’थि’या’र गिरा दो तो हमने कहा कि सहाब हम तो गरीब आदमी हैं, ह’थि’या’र गिरा देंगे तो ये (अं’ग्रेज) हमसे रोटी-रोजी छीन लेंगे।

हमारे समय में माने कि चालीस के दशक में मोंटगोमरी हमारा फौज लीडर था, वह बहुत सख्त व्यक्ति था।निर्देश देता था कि यु’द्ध हमेशा रात में करना होगा।टुक’ड़ियों के मोर्चे बनाता था।उसका काम भिन्न था।एक यु’द्ध में लड़ते हुए मेरे पेट में गो’ली लग गयी, अच्छा हुआ कि एक साथी ने देख लिया और उसने प’ट्टी बाँधकर न’शे की एक टेबलेट दे दी और पीछे भेज दिया।पांच-सात दिन आराम किया और फिर पुनः लड़ाई में भेज दिया गया।डॉक्टर लोग अच्छे होते थे, दवाईयां उन्नत होती थीं।जवान जल्द तैयार हो जाता था।बोयतराम फौज के नियमों के बारे में बताते हैं कि-“फौज के मायने मा’र’णौ अर म’र’णौ सामान्य बात है, सिविलियन नैं कदैई कोनी मा’रै हाँ दु’श्मन कुणसौ ई हो छोड्यौ कोन जाय,चाहे आगै न बाप ई क्यूं न आज्या”।लार्ड माउंट बेटन जनरल था उस वक़्त, किसी बड़े कार्यक्रम में वह आता था।हम लोगों को सलामी देनी होती थी।वैसे एक बात ठीक थी अंग्रेज सरकार में कि फौज के साथ वे कभी दुर्व्य’वहार नहीं करते थे, इसके पीछे कारण था, फौज के लोग उन्हें भाषायी आधार उपलब्ध करवाते थे।

बोयतराम बताते हैं कि उन्हें सबसे पहले अफ्रीका में लिबिया के एक स्थान पर भेजा गया।संवाद का कोई आधार नहीं था आज के समय में फौज में डटे सैनिक वीडियो पर बात कर लेते हैं, परिवार वालों से बातचीत का सिलसिला चलता रहता है लेकिन बोयतराम का समय दूसरा था, वे बताते हैं कि फौज में भर्ती हुए उसके बाद में घरवालों से बात सेवानिवृत्त हुए तब हुई।कोई माध्यम नहीं था बात करने को।

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