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झुंझुनू

चुन्नीलाल गुर्जर जिन्होंने दोनों पैर खोने के बाद हौसले से भरी ऐसी उड़ान कि सब रह गए हैरान

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कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो पर्वत भी ढेला सा लगता है।
मंसूबे हो उड़ने के, तो रोम रोम में दीप सा जलता है।

दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको एक ऐसी शख्सियत से रूबरू करवा रहा हूं। जिसके हौसले ही उसकी जिंदगी है। हौसलों से ही ऐसी उड़ान भरी है कि देखने वाले भी दंग रह जाए।
झुंझुनू के छापोली गाँव के चुन्नी लाल गुर्जर ने खुशबू से बात करते हुए अपने बारे में बताया कि जब मैं आठ वर्ष का था, तब बुखार में मुझे एक इंजेक्शन लगा था। उस इंजेक्शन से मैं पैरालिसिस हो गया।थोड़े समय बाद में मैं ऊपर से तो ठीक हो गया, लेकिन पैर दोनों खराब हो गए। मैं पांचवी क्लास तक छापोली की स्कूल में गोडालियां गोडालियाँ ही जाता था।

शिक्षा तथा संघर्ष।
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जब मैं पांचवी क्लास में था, तो श्रीमान रघुवीर सिंह जी राजपूत ने मुझे एक साइकिल लेकर दी। दो साल बाद में वो टूट गई। फिर दोस्तों की सहायता से मुझे एक व्हीलचेयर मिली। इस प्रकार मैंने बारहवीं क्लास यहीं से पास की।

12वीं क्लास पास करने के बाद में मैं सीकर गया और मैंने वहां पर कंपटीशन की तैयारी शुरू की। मुझे कुछ करना था। तो रोज सीकर बस में सवार होकर जाता, मैं किसी के ऊपर बोझ नहीं बनना चाहता था। मैं अपने आपको दिव्यांग नहीं समझता था, मैं नॉर्मल समझता हुआ सांवली चौराहे पर उतरता और गुड़ता गुड़ता उस चौराहे को पार करता। लोग बाग मुझे अचंभित नजरों से देखते रहते थे। मैं सीकर में सफल नहीं हुआ।

जयपुर की राह।
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सीकर से असफल होने के बाद मैं मेरे दोस्तों की सलाह पर जयपुर चला गया और वहां जाने के बाद में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। बचपन से मुझे आर्मी में जाने का शौक था। और आज भी मैं देश के लिए कुछ बड़ा काम करना चाहता हूं।जयपुर जाने के बाद में मुझे महसूस हुआ कि यहां दिव्यांग कुछ कर सकता है। वह किसी से कम नहीं है और मैं सवाई मानसिंह स्टेडियम में चला गया।

सन 2016 और 2017 मेरा अनुभव की कमी के कारण बेकार चला गया। फिर मैं 2018 में उदयपुर गया। वहां पर भी मैं फाउल होने की वजह से बाहर हो गया। लेकिन मेरे मोटिवेशनल गुरु मोहन सिंह जी भीलवाड़ा ने मुझे कभी हताश नहीं होने दिया। उन्होंने मुझे हमेशा मोटिवेट किया और उन्हीं के पद चिन्हों पर मेरे दोस्तों के साथ में चल रहा हूं। मेरे सारे दोस्त भी मेरे जैसे ही है।

काम के प्रति लगन।
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उदयपुर से मैं जयपुर आ गया। जयपुर में एसबीआई बैंक वालों ने एक मैराथन करवाई थी। वह केवल सामान्य केटेगरी के लिए थी, मैंने सब साथियों के साथ में उसमें भाग लेने की इच्छा जाहिर की। तो प्रबंधकीय कमेटी ने हमारी बात को माना। मैंने वहां पर गोल्ड मेडल जीता। वहां पर मेरी व्हील चेयर सबसे आगे आई थी। उन्होंने बताया कि मेरी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर होने के कारण मेरे पास खेलने के सब साधन उपलब्ध नहीं है।

उन्होंने एक छोटे से बच्चे की तरफ इशारा करते हुए कहा कि यह मेरे सारे काम करता है। मैं जब भाला फेंकता हूं तो भाला ला कर देता है। पानी लाकर दे देता है। जहां व्हील चेयर अटकती है, वहां पर उसको धक्का देता है। मैं जब दुकान में जाता हूं, तो दुकान में भी मेरी पूरी सहायता करता है। बाजार में मैं दुकान सबसे पहले खोलता हूं और सबसे बाद में बंद करता हूं। लोग बाग मुझसे सीख लेने की सलाह देते हैं। यह बच्चा मेरी एक बड़े आदमी जितनी सहायता करता है। आप को दिखाने के लिए पूरे मेरे मेडल घर से लेकर आया है। यह इसी की देन है।

अन्य
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अब मैं रोज 8 घंटे की तैयारी कर रहा हूं । मेरा मुख्य गेम भाला फेंक है। मैं नेशनल खेलूंगा। वैसे मैं किसी भी गेम के लिए हमेशा तैयार रहता हूं। लोग बाग मुझ से प्रेरणा लेते हैं। कि देखो इसकी तरफ।

” जय झलको जय झुंझुनू। ”

अपने विचार।
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सीखो इनसे,
स्कूल इनसे बड़ा नहीं।
वह क्या कर सकता है जिंदगी में,
जो अपने आप से लड़ा नहीं।

विद्याधर तेतरवाल,
मोतीसर।

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