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झुंझुनू

झुंझुनू के छोटे से गाँव में जन्मे ‘बिड़ला’ ने 30 साल की उम्र में खड़ा कर दिया बिज़नेस का साम्राज्य, एक सच्चे देशभक्त की कहानी

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हम सभी ने अपने बड़ों से एक ताना तो जरुर सुना है। वह कहते थे “क्या तू बिड़ला है जो इतनी बड़ी बड़ी बातें करता है”। तो आज हम आपको उन्हीं बिरला की कहानी बताएंगे। आज बात करेंगे हिंदुस्तान के व्यापार जनक और उद्योगपति जगत के जनक घनश्याम दास बिड़ला की। राजस्थान के झुंझुनू जिले के पिलानी में 10 अप्रैल 1894 में घनश्याम दास बिरला जी का जन्म हुआ था। सन 1905 में घनश्याम दास बिरला की शादी दुर्गा देवी से कर दी गई। दुर्गा देवी पिलानी के पास राजस्थान के ही चिड़ावा शहर की थी।

1909 में घनश्याम दास के यहां एक बच्चे का जन्म हुआ। 1910 में टीबी की बीमारी से संक्रमित होकर दुर्गा देवी का निधन हो गया। इसके बाद घनश्याम दास बिरला ने अपने ससुर एम सोमानी के साथ कोलकाता में व्यापार करने की ठानी और 1912 में पहुंच गए कोलकाता। बिरला जी ने यहां दलाली का काम शुरू किया और इसके साथ ही महेश्वरी देवी से इसी साल दूसरी शादी भी कर ली। महेश्वरी देवी से उनके दो पुत्र और तीन पुत्रियां हुई। घनश्याम जी जब 32 वर्ष के थे, तब उनकी उन दूसरी पत्नी का भी निधन हो गया। घनश्याम जी ने इसके बाद शादी नहीं की और अपने पुत्रों को बड़े भाई के भेज दिया और पुत्रियों को छोटे भाई के पास भेज दिया। कुछ ही समय बाद कोलकाता में उन्होंने जूट मिल की स्थापना की।

गांधी जी से मुलाकात

साल 1916 में घनश्याम दास जी की मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। यहीं से दोनों के विचार मिले और दोनों पक्के मित्र बन गए। बताया जाता है कि बिरला जी गांधीजी के करीबी मित्र सलाहकार और सहयोगी भी थे। महात्मा गांधी और घनश्याम जी बिरला ने मिलकर हरिजन सेवक संघ की की भी स्थापना की और 1932 में घनश्याम दास बिरला इस संघ के अध्यक्ष चुने गए। बताया जाता है कि आजादी के दौरान घनश्याम दास बिरला वित्तीय सहायता भी दिया करते थे। साथ ही देश के अन्य पूंजीपतियों को भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के लिए बोला करते थे। घनश्याम दास बिरला ने आजादी से पहले ही देश में उद्योग की शुरुआत की थी।

घनश्याम दास बिरला ने भारत सरकार महात्मा गांधी और अंग्रेजों के बीच में एक दूत के तौर पर भी काम किया। वह दोनों में बातचीत के दौरान भी मीडिएटर की भूमिका निभाते थे। लंदन में कांफ्रेंस के दौरान फर्स्ट और सेकंड राउंड में भारत का नेतृत्व घनश्याम दास बिरला ने ही किया था। भारत की आजादी के दौरान भी पूरी ऊर्जा के साथ तन मन धन से भी सहयोग दिया था।

आइए घनश्याम दास बिरला के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण चीजों पर नजर डालते हैं :-*

1. साल 1918 में कोलकाता में उन्होंने जूट मिल की स्थापना की। 2. साल 1940 में हिंदुस्तान मोटर और हिंदुस्तान टाइम्स की भी स्थापना की। 3. भारत छोड़ो अभियान 1942 के दौरान उन्होंने यूको बैंक की संकल्पना भी की थी। 4. घनश्याम दास बिरला भारत के इतिहास में दूरदर्शी व्यापारी के तौर पर जाने जाते हैं। 5. लंदन में भारत का नेतृत्व किया भारत की आजादी में हर तरह का सहयोग दिया। 6. साल 1957 में उन्हें पद्म विभूषण से भी नवाजा गया। 7. बिरला जी 1932 में हरिजन सेवक संघ के अध्यक्ष बने। 8. भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ के सह संस्थापक भी थे। 9. साल 1964 में बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी एंड साइंस की स्थापना अपनी जन्मभूमि पिलानी में की थी। 10. बी.के.के.एम की स्थापना भी की। 11. साल 1939 से साल 1969 के दौरान टाटा की संपत्ति केवल 8 गुना बढ़ी थी, और बिड़ला जी की सम्पति में 94 गुना का इजाफा हुआ था।बिरला जी के ऐसे ना जाने ऐसे कई काम किए जो भारत की तरक्की के लिए थे। बिरला ब्रदर्स का व्यापार आज कपड़ा, तिस्कर, फिल्मेर, सीमेंट, रासायनिक पदार्थ, बिजली , उर्वरक, दूरसंचार व वित्तीय सेवा जैसी कई दिशाओं में फैला है। एक रिपोर्ट की मानें तो बिरला की आज कुल संपत्ति 195 अरब रुपए की है।

ऐसा नहीं है कि बिरला जी केवल व्यापार और पैसों के लिए ही काम करते थे। असल में उन्होंने कभी खुद को व्यापारी के तौर पर माना ही नहीं। इसी के साथ उन हो उन्होंने अपना जीवन हमेशा लोगों की मदद के लिए आगे रखा।

बिरला जी का एक रोचक किस्सा: 

एक बार का वाकया बताएं तो 1 दिन बिरला जी कार्यालय जाने के लिए समय से लेट हो गए। उन्होंने ड्राइवर को गाड़ी तेज चलाने के लिए कहा जिससे वह कार्यालय जल्दी पहुंच सके। इस दौरान उनकी गाड़ी एक नदी के पास से गुजर रही थी। उसी समय उन्होंने नदी के पास जमा भीड़ को देखा, बिरला जी ने ड्राइवर से पूछा कि इसका क्या कारण हो सकता है। ड्राइवर ने कहा साहब शायद नदी में कोई डूब गया होगा। कार्यालय जाने के लिए लेट हो रहे हैं बिरला जी ने वही गाड़ी रुकवाई और जाकर मामला देखा। जब उन्होंने देखा कि नदी के अंदर एक 10-12 साल का बच्चा डूब रहा है और भीड़ केवल बचाव बचाव के अलावा दूसरा कोई काम नहीं कर रही हैं।

तो बिरला जी बिना कुछ दूसरी बात सोचे नदी में कूदे गए और उस बच्चे को बचाया। गीले कपड़ों के साथ वह अस्पताल पहुंच गए और डॉक्टर से इलाज करने को कहा, डॉक्टर ने जब उन्हें आश्वासन दिया कि बच्चा ठीक हो जाएगा तब उसके बाद बिरला जी ऑफिस गए। जब कार्यालय के कर्मचारियों ने बिरला जी की यह बात सुनी तो सभी ने उनकी प्रशंसा की लोगों ने कहा साहब आप महान हैं। लेकिन बिरला जी ने मुस्कुराते हुए यह जवाब दिया कि यह तो मेरा कर्तव्य था मेरा ही नहीं भीड़ में खड़े हर एक व्यक्ति का कर्तव्य था कि किसी मददगार की मदद की जाए।

साल 1934 में घनश्याम दास बिरला ने अपने पुत्र बसंत कुमार बिरला के लिए एक पत्र लिखा।

पत्र बड़ा प्रेरित करने वाला है,उन्होंने लिखा कि जो मैं लिखता हूं उसे बड़े होकर भी से पढ़ना। मनुष्य का शरीर सबसे जरूरी है, शरीर का दुरुपयोग जो भी करता है। वह पशु के बराबर होता है। जो धन आज तुम्हारे पास है उसको सेवा के लिए उपयोग करना। अगर वह सेवा के लिए उपयोग किया जाए तो साधन सफल है। धन का प्रयोग मौज मस्ती में मत करना। अपने ऊपर कम से कम खर्च करना और लोगों की सेवा में ज्यादा से ज्यादा उसका उपयोग करना।

तुम्हारे धन से किसी के साथ अन्याय ना हो इसका खास ख्याल रखना। अपने आने वाली पीढ़ी को भी यह समझाना। अगर वह मौज-मस्ती ऐश आराम में अपना धन खर्च करती है तो यह पाप होगा। इससे व्यापार चौपट होगा इससे अच्छा तो वह धन जन कल्याण में लगा देना। हम भाइयों ने बड़ी मेहनत से इस व्यापार को बनाया है । साथ ही भगवान को कभी ना भूलना वह बुद्धि देता है। घनश्याम दास बिरला ने पत्र में शरीर और स्वास्थ्य को लेकर भी अपने पुत्र को समझाया उन्होंने लिखा कि, रोजाना थोड़ा व्यायाम करना शरीर का ध्यान रखना। स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी संपदा है। सुख समृद्धि के लिए स्वास्थ्य ही पहली शर्त है। स्वास्थ्य ना होने पर करोड़पति,अरबपति डूब जाते हैं। उन्होंने लिखा कि भोजन को दवा के तौर पर ग्रहण करना। जीने के लिए खाना न कि खाने के लिए जीना।

तुम्हारा घनश्याम दास बिरला

11 जून 1983 में घनश्याम दस बिरला ने जीवन की आखिरी सांस ली।

राजस्थान के छोटे शहर से बढ़कर भारत के अमीर व्यक्तियों की सूची में अपना नाम दर्ज कराने वाले घनश्याम दास बिल्ला की कहानी हम सब को प्रेरित करती है। जो आज बिरला मंदिर हम जगह-जगह देखते हैं, उसे भी घनश्याम दास बिरला ने ही बनवाया था। बिरला जी की कहानी से हम सब को यह प्रेरणा मिलती है कि जीवन में कुछ भी हासिल करना हो तो वह मुश्किल हैं परन्तु असंभव नहीं है। जमीन से हमेशा जुड़े रहना चाहिए फिर दौलत आपकी जेब में कितने भी हो।

आप क्या सोचते हैं उनके जीवन से हमें कमेंट करके जरूर बताए।

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