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झुंझुनू

भोड़की की जमवाय माता मंदिर का चम’त्कार युद्ध में मरे राजा को जिन्दा किया

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शताब्दी ग्यारहवीं, जयपुर आमेर का हिस्सा था।आमेर पर मीणाओं का राज था, कच्छवाह वंश के राजा दुल्हराय ने मीणाओं से युद्ध किया और परास्त होकर वे अपनी फौज के साथ बेहोशी की हालत में युद्ध मैदान में गिर पड़े।मीणाओं की सेना का खुश होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत था।रात के समय बुढवाय( जमवाय) माता वहाँ आयीं और राजा के सिर पर हाथ फ़ेर कर कहा कि – उठ!

मान्यता है कि तभी दुल्हराय उसी समय खड़े होकर देगी की स्तुति करने लगे।और राजा को कहा कि आज से तुम मुझे जमवाय माता के रूप में पूजोगे और इसी घाटी में मेरा मंदिर भी बनवाओगे।तब से जमवाय माता जयपुर राज परिवार की कुलदेवी है।कछवाह वंश के अलावा जमवाय माता गढ़वाल जाति की भी कुलदेवी है।जिस मंदिर की हम आज बात कर रहे हैं वह झुंझुनूं की उदयपुरवाटी तहसील के भोड़की गाँव में स्थित है।

मंदिर के निर्माण के बारे में मान्यता है कि यह तकरीबन साढ़े सात सौ साल पुराना है।कथा यूँ है -धामा जी नाम के एक गढ़वाल थे।शुरू में उनके पुरखे गढमतदेसर में रहते थे, वहाँ बादशाह के डर के कारण कुछ हिमाचल प्रदेश की ओर पलायन कर गये तो कुछ इधर आ गये।धामा जी सबसे पहले यहां धणावता में आये थे।सात सौ सत्तावन में वे यहाँ आए थे।पहले वे किसी आरोप के कारण बादशाह के बुर्ज में कैद रहे।छह महीने तक बादशाह ने उन्हें अन्न और जल के लिए नहीं पूछा।कथा है कि उस समय उस बुर्ज में स्वत: ही भोजन-पानी की व्यवस्था हो गयी।तब उनको विश्वास हो गया कि माताजी कृपा मुझ पर है।इसी कारण गढ़वाली लोग बड़ी श्रद्धा से जमवाय मां की पूजा करते हैं।लोक में धामा जी को लेकर एक रचनात्मक भाग प्रचलित है वह कुछ यूं है –

“धामा घोड़ी हांकौ,उत्तराखंड में दो चौरासी ढलकाय
जठै पोड रुकै घोडी़ का बठै म्हांको होद बणाय
जींसै बावन पैंड दिखणादै नाकै, म्हारौ भवन बणाय”

उपर उक्त पंक्तियाँ किसी ज़माने में यहाँ पूजा करने वाले एक पुजारी जी ने लिखे थे, बताते हैं कि उनके मुख पर आ गए और उन्होंने इन्हें लिख दिया।उनका नाम चिकु खाती था।जो कि कोई पुष्टि आधार नहीं प्रदान करता।चैत्र शुक्ल की अष्टमी और आसोज में यहाँ मंदिर में विशाल मेला भरता है। किसी प्रकार के व्यसन से दूर यह मंदिर शुद्ध सात्त्विक है।मेला मरता है तब भोड़की गांव से झांकी निकलती है जिसमें ढपली बजायी जाती है और घुंघरु बंधे दर्जन लोग नाचते हुए आते हैं।

मंदिर परिसर के पीछे एक तालाब है, मान्यता के अनुसार वह मंदिर स्थापना के दिनों से बना हुआ है।वह लगभग हर मौसम में भरा रहता है।ज़माना दूसरा था, बारातें, खर्च आदि के लिए लोगों के बीच पास आवागमन का साधन केवल ऊंट घोड़ा थे, तो रास्ते में प्यास लगना बहुत स्वाभाविक बात होती थी ऐसे में ये तालाब संजीवनी से कम नहीं साबित होते थे।मंदिर प्रॉपर भोड़की गांव में है।शेखावाटी में मंदिरों की अवस्था आज भी ठीक ठाक है।माने कि अपेक्षाकृत सुधार है।इसके पीछे कारण रहा यहां के सेठों का योगदान।वे हमेशा मंदिरों, शिक्षा, स्वास्थ्य और विरासत के संरक्षण हेतु काम करते रहते थे।दान देते रहते थे।

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