शहीद ने कारगिल युद्ध में जिगरियों के साथ किया था शहादत का अनोखा वादा- दोस्तों ने आज किया पूरा!

Jhunjhunu Subedar Rajendra Prasad: यह बात सन् 1999 की है। उस वक्त भारत-पाक का युद्ध चल रहा था। इस युद्ध में झुंझुनूं के मालीगांव (MaliGaun) के चार दोस्त- सूबेदार राजेंद्र प्रसाद, मनोज भाम्बू, राजवीर सिंह और कमलेश भी शामिल थे। जवानों की उम्र महज 25 से 26 साल तक के बीच थी। कारगिल की इस लड़ाई में सूबेदार ने अपने साथियों से कहा- दोस्तों, हम एक ही गांव के हैं, मालूम नहीं कब किसको तिरंगे से लिपटकर गांव जाने का सौभाग्य मिले, यदि हममें से कोई भी जवान शहीद होगा तो उसका पार्थिव शरीर हमीं में से किसी को ले जाना होगा। वह पल हम सभी के लिए बेहद गर्व का होगा।

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युद्ध में झुंझुनूं के इन जवानों ने, अपने अदम्य साहस तथा पराक्रम से दुश्मन की ईंट से ईंट बजा कर रख दी थी। इस युद्ध में भारत की विजय हुई और चारों जवान सुरक्षित रहे। उन्होंने इस युद्ध में अपने प्राणों को दांव पर लगाकर दुश्मन से अपने इलाके की सुरक्षा की थी। लेकिन दोस्तों आज कारगिल के 23 साल बाद,  सूबेदार राजेंद्र प्रसाद ने देश की हिफाजत के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया है, वह 11 अगस्त को दुश्मन से मां भारती की रक्षा करते हुए शहीद हो गए। साथियों,  एक जवान हमारी सुरक्षा और देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान खुशी-खुशी कर देता है, मानो वह सेना में भर्ती ही इसलिए हुआ हो ताकि वह अपने प्राणों की आहुति देते हुए देश की रक्षा कर सके। ऐसे जांबाज के आगे हर देशवासी को नतमस्तक होना चाहिए।

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शहीद सूबेदार राजेंद्र प्रसाद के साथी- मनोज भाम्बू- जो कारगिल युद्ध में उनके साथ थे। बताते हैं कि- हम चारों दोस्तों में से तिरंगे में लिपटकर गांव आने का सौभाग्य आखिर राजेद्र प्रसाद को मिला। हमें उनकी शहादत पर गर्व है। मनोज कहते हैं कि आज राजेंद्र की बात सच हो गई, राजेंद्र के साथी और हम दोस्तों में से एक राजवीर सिंह पार्थिव शरीर लेकर मालीगांव पहुंचे, आज सीना गर्व से फूल रहा है। हमारे दोस्त हमारे भाई ने देश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

मनोज बताते हैं कि कारगिल युद्ध में झुंझुनूं जिले ने 19 जवानों को खोया था। जब कभी हमें सूचना मिलती कि झुंझुनूं का जवान शहीद हो गया- तब हमें दुख तो होता ही था, मगर हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाया करता था। मनोज बताते हैं कि युद्ध के समय वे बेखौफ होकर लड़ा करते थे। उन्हें किस वक्त युद्ध के लिए जाना पड़ा जाए इसका कोई वक्त नहीं हुआ करता था। मनोज कहते हैं- राजेंद्र जांबाज थे, हम सब एक ही टीम में शामिल थे, उस समय कश्मीर में अभियान चालाकर कई आतंकवादियों को पकड़ा था। राजेंद्र निर्भिक होकर दुश्मन का सामना करते थे। यही कारण था कि हमारी टीम में हमेशा सराहना की जाती थी। मनोज सन् 2014 में सेना से रिटायर्ड होकर मालीगांव आ गए थे।

Jhunjhunu Subedar Rajendra Prasad

बीती 11 अगस्त को राजेंद्र (Jhunjhunu Subedar Rajendra Prasad) दुश्मन का सामना करते हुए शहीद हो गए, इस बीच उन्होंने दोनों आतंकवादियों को चित्त कर दिया था। इस हमले में तीन जवान शहीद हुए जिनमें राजेंद्र प्रसाद भी शामिल थे। परिवार को उनकी शहादत पर गर्व है। आज उन्हें सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जाएगी।

दुश्मन को चारों खाने चित्त कर खुद शहादत को प्राप्त हुए झुंझुनूं के सूूबेदार- जम्मू में थी तैनाती!

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