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झुंझुनू

आजादी के असली हीरो झुंझुनू के आजाद हिंद फौज के सिपाही सेडूराम कृष्णियां की कहानी,18 दिन तक भूखे रहे

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आज हम आपको कहानी बताएंगे आ’जाद हिं’द फौ’ज के सिपाही सेडूराम कृष्णिया की। सेडूराम कृष्णिया झुंझुनू जिले के बुडाना गांव के रहने वाले हैं। उनकी उम्र की बात करें तो वह लगभग 104 वर्ष के है।आज भी पूरे जुनून के साथ अपना जीवन यापन कर रहे हैं। सेडूराम कृष्णिया अपने जीवन के बारे में बताते हैं कि जब वह 21 वर्ष के थे तो, द राजपूताना बटा’लियन में राइ’फलमैन के तौर पर भर्ती हुए।

वह बताते हैं कि सुभाष चंद्र नेताजी के साथ उनकी मुलाकात जन्म जर्मनी में हुई। वहीं पर नेताजी ने “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा” यह नारा दिया। इसी के साथ नेताजी बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन भी किया। इसके बाद सेडूरामजी भी इस फौज में भर्ती हो गए और 21 वर्ष की आयु में द राज’पूताना बटा’लियन के राइफ’लमैन के तौर पर तैनात हो गए। वह बताते हैं कि भर्ती के कुछ समय बाद ही उन्हें देश के बाहर भेज दिया गया।

जिसके बाद आजादी की ल’ड़ाई के दौरान फ्रांस द्वारा भारत के आजाद हिंद फौज के 5000 सैनिकों को बं’धक बना लिया गया। सेडूराम जी ने अपनी कहानी बताते हुए बताया कि 18 दिन तक 5000 सैनिकों को कुछ भी खाने को नहीं दिया गया और वह लोग 18 दिन तक भूखे रहे।

19 वें दिन खाने को डबल रोटी और चाय मिली। फ्रांस के लिए ली’बिया जे’ल से सभी सैनिकों को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ही छुड़वाया था। लेकिन तब तक सभी ने 3 साल की कै’द काट ली थी।

सेडूराम कृष्णिया ने शादी नहीं की और वह अविवाहित है। उनका ख्याल उनके भाई का परिवार रखता है। सेडूराम जी की उम्र 105 वर्ष है लेकिन आज भी वह बिना सहारे के घूमना फिरना करते हैं। साथ ही अचंभे की बात है कि इतनी बड़ी आयु में भी उनकी आंखें खराब नहीं हुई और बिना चश्मे के अखबार पढ़ते हैं।

भारत की तत्कालीन और स्वर्गीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया है। सेडूराम जी बताते हैं कि उन्होंने देश की आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया। अब उनकी उम्र ज्यादा हो चुकी है और वह चाहते हैं कि सरकार उनके परिवार को थोड़ा सहयोग व मदद करें।

इसी के साथ सेडूराम कृष्णिया जी ने बताया कि उनके जीने की इच्छा अभी खत्म नहीं हुई है। वह जिंदगी में और वर्ष तक जीना चाहते हैं। वह चाहते हैं कि जब तक वह स्वस्थ हैं तब तक पूरे जोश और जुनून के साथ अपनी जिंदगी जीते रहे। यह कहानी हैं देश की आजादी में अपना योगदान देने वाले सेडूराम कृष्णिया जी की,जिनके हौसले आज भी बुलंद हैं।

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