झुंझुनूं के विश्व रिकॉर्ड मैन की कहानी जिन्होंने चौरंगीनाथ चालीसा को लकडी़ पर उकेरा

नालपुर (झुंझुनू) के रहने सुरेन्द्र कुमार जांगिड़ वो शख्सियत हैं जिनकी कला को विश्व के 128 देशों ने मान्यता दी है। सुरेन्द्र कुमार हाथ से लकडी़ पर लेखन करते हैं जो विश्वभर में अपने आप में अनूठा और अनुकरणीय काम है। इन्होंने गांव के संत पूर्णमल, बाबा चौरंगीनाथ चालीसा को लकडी़ पर उकेरा है।

सुरेन्द्र बताते हैं कि वे 2015 से लगातार यह काम करते आ रहे हैं। उनका कहना है कि लकडी़ पर लिखना बहुत ही मुश्किल काम है खासकर तब जब आप सारा काम हाथ से करते हों। इन्होंने बताया कि पतली और नरम लकडी़ पर लिखना संभव नहीं है यह औजार की चोट से फट या टूट जाती हैं, वहीं सीसम पर लिखना आसान है। अखरोट या चंदन की लकडी़ के इस्तेमाल किया जाए तो और भी सफाई और सुंदरता आती है।

इनके किए काम की सराहना दूर-दूर तक की जाती है, ये क्षेत्र में हस्तशिल्प मेले में भी अपनी कला को आजमा चुके हैं। उनकी कला के पारखी उन्हें दूर-दूर से ऑर्डर भेजते हैं। वे स्पेशल ऑर्डर पर लकडी़ की किताबें, सीनरी, पेन इत्यादि बनाते हैं। बातचीत के दौरान सुरेन्द्र कुमार जी से हमें से हमें पता चला कि शुरूआत में जब इन्होंने लोगों को अपनी कला के बारे में बताया तो उनका काफी मजाक बनाया गया। मगर वे अपनी धुन के पक्के थे। उन्होने लगातार मेहनत करके जब अपनी पहली किताब तैयार करी और लोगों को दिखाई तो सबने उसकी भूरी- भूरी प्रशंसा की।

इसी तरह एक दिन उन्हें किसी परिचित से वर्ल्ड रिकॉर्ड के बारें में पता चला और सुरेन्द्र ने ठान लिया की अपनी कला का लोहा वे दुनियाभर में मनवा कर ही छोडे़ंगे। शुरू-शुरू में नेशनल अवॉर्ड्स के लिए अप्लाई किया फिर वहां से विश्व रिकॉर्ड तक का सफर उन्होनें लगातार दौड़धूप करते करते किया। सुरेन्द्र एक बी पी एल परिवार से आते अत: अपने इस काम के अतिरिक्त घर खर्च चलाने के लिए वे बढ़ई का काम करते हैं। इस पेशे में वे शुरुआत से ही हैं। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के कारण वे औपचारिक शिक्षा बारहवीं तक ही ले पाए और उसके बाद अपने पिता के साथ काम में हाथ बंटाने लगे।

हमारे देश की एक मुख्य समस्या यह है कि हम कलाकारों को उनका उचित हक और सम्मान दिलाने में हमेशा से असफल रहे हैं। इसका एक कारण सरकार की नीतियां और प्रवृतियां ही रही हैं। सरकारों के उदासीन रवैऐ के चलते कलाकार की कला घुट- घुटकर दम तोड़ देती है। ऐसे ही कुछ हाल सुरेन्द्र कुमार जी के भी हैं। इनका दावा है कि अगर अगर सरकार उनकी मदद करे तो वे बीसीयों रिकॉर्ड देश के नाम करा सकते हैं। इस बाबत सुरेन्द्र नेन पी एम ओ को चिठ्ठी भी लिखी पर उसका कोई संतोषजनक जवाब वहां से नहीं मिला। वे यह भी बताते हैं कि वर्ल्ड रिकॉर्ड संस्थान की ओर से उन्हें मानद डॉक्टरेट की डिग्री का ऑफर भी मिला परतुं जिला प्रसाशन और अन्य सभी जगहों से आर्थिक सहायता के नहीं मिलने से उन्हें संस्थान को इसके लिए मना करना पडा़।

माटी का यह लाल आर्थिक हालात के चलते शायद वह मुकाम हासिल नहीं कर पाया जो करने का सपना उसने देखा था। परतुं फिर भी अपनी कला, अपनी मेहनत और लगन के दम पर विश्वभर में यह अनूठा रिकॉर्ड बनाकर अपने देश का अपनी जन्मभूमि का नाम इन्होंने रोशन किया। हमारी और से प्रशासन और सरकार से यह गुजारिश है कि सुरेन्द्र को और उनके जैसे दूसरे कलाकारों को सरकार आर्थिक संरक्षण प्रदान करे। उनको नई तकनीक और उचित सम्मान दिलवाए जिससे और लोगों को भी अपने देश के लिए कुछ अनूठा, कुछ सुंदर, कुछ बेमिशाल काम कर गुजरने की प्रेरणा मिले।

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