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राजस्थान

हल्दीघाटी की खू’न तलैया से महाराणा प्रताप के शौर्य की वीर गाथा, देखें प्रताप गुफा का रहस्य

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प्रताप का सिर झुका न सका, इस पर अकबर भी शर्मिंदा था।
चैन से उसको सोने ना दिया, जब तक मेवाड़ी राणा जिंदा था।

दोस्तों नमस्कार।

दोस्तों आज मैं आपको उस वीर पुरुष, इतिहास पुरुष,जन-जन के चहेते विश्व विख्यात महाराणा प्रताप की जीवनी के कुछ अंश आप के सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। राजस्थान का जब नाम आता है तो महाराणा प्रताप का नाम कैसे अलग रह सकता है।

प्रताप गुफा।
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एक बार महाराणा प्रताप की सेना यु’द्ध के अंदर लगभग समाप्त हो गई थी। तब यहां आकर इस गुफा के अंदर उन्होंने शरण ली थी, और प्रण किया था कि जब तक मैं इस देश को आजाद नहीं करवा दूंगा, तब तक सोने चांदी के बर्तनों में खाना नहीं खाऊंगा। महलों में सोऊंगा नहीं आदि।

यहीं पर उनका सामना भीलू राणा से हुआ तो उनके सहयोग से उन्होंने फिर से एक बड़ी सेना तैयार की। जिसमें भाला चलाना तथा तल’वार चलाना सब सिखाया जाता था। इसी गुफा से यु’द्ध से संबंधित सभी दिशा निर्देश दिए जाते थे। यहीं से पूरी सेना तैयार होकर मुगलों की सेना पर टूट पड़ी और हल्दी घाटी की खू’न तलैया तक 7:30 घंटे के यु’द्ध में मुगलों की पूरी सेना को समाप्त कर दिया था।

हल्दीघाटी का इतिहास।
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प्रताप गुफा से थोड़ा आगे चलते ही हल्दीघाटी दर्रा नाम से प्रसिद्ध जगह है। जहां से पूरी हल्दीघाटी का यु’द्ध लड़ा गया था। उस दिन साडे सात घंटे के यु’द्ध के दौरान थोड़ी बरसात भी हो गई थी। उसके कारण जो पानी इकट्ठा हुआ था, वह बिल्कुल लाल था, और इसीलिए उस जगह को आज भी खू’न तलैया के नाम से पुकारा जाता है।

यह गुफा 38 किलोमीटर पर एकलिंग जी महाराज है, वहां पर निकलती है और 125 किलोमीटर पर चित्तौड़ दुर्ग में निकलती है। अब सरकार बनने के बाद में महाराणा प्रताप के भाला, कवच, ढाल, तलवार सब कुछ म्यूजियम में रख लिया गया। बस यहां केवल यह प्रताप गुफा नाम से रह गई।अब इस गुफा को पुरातत्व विभाग के अधीन कर दिया गया है।

महाराणा प्रताप का व्यक्तित्व।
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महाराणा प्रताप की हाइट 9 फुट की थी। तथा उनके भाले का वजन पचास किलो था। और एक बड़ा लोहे का बकड था। महाराणा प्रताप के घोड़े का नाम चेतक था जब चेतक ने 22 फुट का नाला पार किया, उस समय नीचे गिरते ही उसने प्राण त्याग दिए। नीचे समतल जमीन में चेतक की समाधि और पास में शिव मंदिर बना हुआ है, यह 500 वर्ष पुराना है।

महाराणा प्रताप के तीन वर्ष के जंगल प्रवास के दौरान अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जिनमें सेना का पुनर्गठन, बच्चे की घास की रोटी को बिलाव के द्वारा छीन के ले जाना, अटल प्राण आदि शामिल है। हल्दीघाटी के युद्ध का मैदान, म्यूजियम, प्रताप गुफा आदि सभी दर्शनीय स्थलों को देखने हेतु प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी आते हैं। और अपने इतिहास पुरुष की छोटी-छोटी बातों को अपने ह्रदय में उतारने की कोशिश करते हैं

अन्य।
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ग्वालियर के तीन तंवर भाइयों ने महाराणा प्रताप के पक्ष में ल’ड़ाई के मैदान में अपनी शहादत दी थी। तो उनकी भी वहां पर छतरियां बनी हुई है। जो शोर्य का प्रतीक है। उनकी याद में महाराजा कर्ण सिंह ने 1681 में यहां पर छतरी बनवाई थी।

विद्याधर तेतरवाल, मोतीसर।

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